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पानीपत

इस बीमारी की चपेट में आ रहें हैं पानीपत के लोग, कैसे करें पहचान… बुखार से शुरुआत..

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हैपेटाइटिस-बी और सी के मरीजों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। पानीपत जिले में जनवरी माह में पंजीकृत मरीजों की संख्या 1540 के पार पहुंच गई है। इनमें 70 प्रतिशत मरीज समालखा व बापौली ब्लॉक से शामिल हैं। सिविल अस्पताल के सीनियर मैडीकल ऑफिसर (एस.एम.ओ.) डा. श्याम लाल ने बताया कि हैपेटाइटिस वायरल इन्फैक्शन के कारण होता है। वायरस के अनुसार इसे मुख्य 5 वर्गों में विभाजित किया गया है। हैपेटाइटिस-ए और ई दूषित खानपान के कारण पनपता है। हेपेटाइटिस-बी संक्रमित ब्लड शरीर में पहुंचने, हैपेटाइटिस-सी वायरस (एच.सी.वी.) के कारण होता है। संक्रमित ब्लड और इंजेक्शन का इस्तेमाल इसकी वजह है। हैपेटाइटिस-डी वायरस (एच.डी.वी.) के कारण होता है। जो लोग पहले से रोगी हैं, वे ही इस वायरस से संक्रमित होते हैं। जिला पानीपत की बात करें तो अधिकतर मरीज हैपेटाइटिस-बी और सी से पीड़ित हैं।

3 माह चलती है दवाई 

हैपेटाइटिस के 60 प्रतिशत मरीज 17 से 30 की उम्र के हैं। सिविल अस्पताल और सी.एच.सी.-पी.एच.सी. के डाक्टर मरीजों को 3 माह तक लगातार दवाई का सेवन करने और बीमारी से बचाव का तरीका भी बताते हैं। कोर्स पूरा होने पर मरीज को दोबारा आर.एन.ए. टैस्ट की सलाह दी जाती है। रिपोर्ट पॉजीटिव आने पर दोबारा से कोर्स शुरू करवाकर दवाई शुरू की जाती है।

हैपेटाइटिस-बी के कारण

स्नसंक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध।  स्नसंक्रमित सुई, ब्लेड, उपकरण का इस्तेमाल करना।  स्नदाढ़ी की ब्लेड या टूथब्रश जैसा व्यक्तिगत सामान संक्रमित व्यक्ति के साथ इस्तेमाल करना।  स्नगर्भावस्था में प्रसव के समय संक्रमित माता से शिशु को हैपेटाइटिस-बी हो सकता है।  स्नब्लड ट्रांसफ्यूजन या ऑरगन ट्रांसप्लांट करते समय ठीक से जांच नहीं किए जाने पर हैपेटाइटिस-बी फैल सकता है।

हैपेटाइटिस-बी के लक्षण:

​​​​​​हैपेटाइटिस-बी के अधिकतर मरीजों को काफी समय तक कोई लक्षण नजर न आने के कारण उन्हें पता भी नहीं रहता है कि वह इस रोग से पीड़ित है।

स्नचमड़ी और आंख का रंग पीला होना। स्नकमजोरी, भूख कम लगना।  स्नपेशाब का रंग पीला/लाल होना।  स्नसिरदर्द, बुखार, पेट दर्द।  स्नजी मचलाना, उल्टी, खुजली।

हैपेटाइटिस-बी टीका : स्नडोज 1 – जन्म के 24 घंटे के भीतर 

स्नडोज 2 – जन्म के 6 हफ्ते बाद  स्नडोज 3- जन्म के 10 हफ्ते बाद  स्नडोज 4 – जन्म के 14 हफ्ते बाद
किशोरों को 18 साल की उम्र होने तक टीका लगाया जा सकता है। खासकर यदि उन्हें शुरूआती उम्र में न लगा हो तो।

हैपेटाइटिस इंफैक्शन से बचाव के लिए स्वस्थ आहार लेना, साफ पानी पीना और साफ-सुथरे माहौल में रहना, नियमित व्यायाम और शराब पीने से दूर रहना जरूरी है। बीमारी का जल्द इलाज ना हो तो लीवर का कैंसर हो सकता है। मरीजों को समय रहते हुए इसका इलाज व दवाइयां सुचारु रूप से लेनी चाहिए।

डा. श्याम लाल, एस.एम.ओ., सिविल अस्पताल, पानीपत।

इलाज की प्रक्रिया जटिल 

सबसे पहले मरीज का सिविल अस्पताल में एच.सी.वी. टैस्ट होता है। इसके बाद अल्ट्रासाऊंड, सहित शूगर, एल.एफ.टी., के.एफ.टी. आदि टैस्ट होते हैं।  कूपन दिखाकर डा. लाल पैथ लैब में मरीज का आर.एन.ए. और जिनोटाइप टैस्ट होता है। इससे रोग की कैटेगरी का पता चलता है। इसके बाद मरीज को दवाई देते हैं।

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