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भिवानी

7 महीने की जुड़वां बेटियों ने छुए पैर, तब चली शहीद की शवयात्रा, पत्नी बेहोश

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भारत माता के जयकारे और नम आंखों के बीच बीएसएफ में असिस्टेंट कमांडेंट गजेंद्र सिंह को हजारों लोगों ने अंतिम विदाई दी। सात माह की बेटियों से जब पिता के चरण स्पर्श कराए तो सबकी आंखें नम हो गईं। शहीद गजेन्द्र को शादी के 14 साल बाद पिछले साल अगस्त में ही दो बेटियां हुई थी।

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शुक्रवार सुबह शहीद गजेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर भिवानी स्थित उनके पैतृक गांव खरक कलां पहुंचा। जैसे ही शव पहुंचा, देखकर पत्नी बेहोश हो गई। मां बेटे के शव से लिपट कर बिलख बिलख रोई तो सभी की आंखें भर आईं। बुजुर्गों ने बड़ी मुश्किल से परिजनों को ढांढस बंधाया।

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शहीद के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शनों व संस्कार क्रियाओं के लिए कुछ देर के लिए घर पर रखा गया। वहीं वीर सपूत की शहादत को नमन करने के लिए हजारों लोग गांव पहुंचे और भारत माता की जय व शहीद गजेंद्र अमर रहे… के नारे लगाते रहे। हाथों में तिरंगा थामे युवाओं की भीड़ के बीच शहीद की अंतिम यात्रा शुरू हुई।

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विधायक बिशंबर वाल्मीकि ने शहीद की अर्थी को कंधा दिया। गांव भर की महिलाओं ने अपने घरों की छत पर खड़े होकर अपने जवान को अंतिम विदाई दी। खरक बस स्टैंड पहुंचने पर स्कूली छात्राओं ने मानव श्रृंखला बनाकर शहादत को सलाम किया। भतीजे ने मुखाग्रि दी, पूरे राजकीय सम्ममान के साथ शहीद की अंत्येष्टि की गई।

शहीद के भाई पवन ने कहा कि कि भाई के जाने का दुख वे बयां नहीं कर सकते। शव घर पहुंचते ही सबसे पहले उसकी मां ओमपति को गजेन्द्र के अंतिम दर्शन कराए गए। इसके बाद पत्नी मोनिका को अंतिम दर्शन के लिए लाया गया, लेकिन वह शहीद पति का शव देखते ही बेहोश हो गई।

अंतिम संस्कार के मौके पर विधायक बिशंभर ने कहा कि सरकार की तरफ से 50  लाख रुपये व एक सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया। गांव में शहीद के नाम पर कम्यूनिटी सेंटर का निर्माण करवाया जाएगा। गजेन्द्र सिंह के पिता मोतीराम सहित अधिकतर सदस्य सेना भर्ती होकर देश की सेवा कर चुके हैं या कर रहे हैं।

बता दें कि 7 मार्च को छत्तीसगढ़ के कांकेर जिला में नक्सली हमले में सहायक कमांडेंट गजेंद्र सिंह शहीद हो गए थे। गजेंद्र कांकेर जिला में सीमा सुरक्षा बल की 134वीं बटालियन में तैनात थे। गजेंद्र सिंह का जन्म खरक कला गांव में मोती लाल व ओमपति के घर 31 अक्टूबर 1976 को हुआ था।

गजेंद्र ने गांव के राजकीय विद्यालय से दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की। भिवानी के वैश्य कॉलेज से स्नातक करने के बाद 2 नवंबर 1998 को गजेंद्र सिंह बीएसएफ में एएसआई के पद पर भर्ती हो गया। 2003 में गजेंद्र का विवाह गुडियानी निवासी मोनिका के साथ हुआ। कुछ माह पहले ही उनके घर जुड़वां बेटियों का जन्म हुआ था।

घर में चार भाई-बहनों के बीच सबसे छोटा होने की वजह से गजेंद्र सिंह सबके चहेते थे। गजेंद्र सिंह अपने पीछे दो बड़ी बहने, एक भाई, माता व पत्नी सहित दो बेटियां छोड़ गए हैं। गजेंद्र के पिता दिवंगत मोती भी सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त हुए थे। गजेंद्र ने अपने पिता से प्रेरणा लेते हुए फौज में भर्ती हुए थे।

 

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