हरियाणा के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने वाले 300 से अधिक एमबीबीएस डॉक्टरों के सामने अपने करियर को लेकर गंभीर अनिश्चितता पैदा हो गई है। वर्ष 2020 में राज्य सरकार द्वारा लागू की गई और 2022 में संशोधित बॉन्ड नीति के अंतर्गत आने वाले इस बैच के चिकित्सकों का आरोप है कि पढ़ाई पूरी होने के आठ महीने बाद भी उन्हें न तो स्वास्थ्य विभाग में अनुबंध के अनुसार नियुक्ति दी गई है और न ही उनके जमा किए गए मूल शैक्षणिक प्रमाण-पत्र लौटाए जा रहे हैं।
यह स्थिति तब और अधिक संवेदनशील हो गई है जब इस बैच के 300 से अधिक डॉक्टरों ने नीट-पीजी (NEET-PG 2026) की कठिन प्रवेश परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली है। उच्च चिकित्सा शिक्षा यानी एमडी और एमएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली काउंसलिंग प्रक्रिया में अभ्यर्थियों को अपने मूल प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। मूल दस्तावेज न मिलने की स्थिति में इन प्रतिभावान युवा डॉक्टरों का एक साल का शैक्षणिक सत्र और कठिन परिश्रम से हासिल की गई मेरिट निरस्त होने का खतरा बन गया है।
बॉन्ड नीति का पेंच और मूल दस्तावेजों को रोके जाने का प्रशासनिक विवाद
पीड़ित चिकित्सकों के अनुसार, 2020 की बॉन्ड नीति के नियमों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि अनिवार्य सेवा की शर्त पूरी न होने तक केवल एमबीबीएस की अंतिम डिग्री रोकी जा सकती है। इसके विपरीत, संबंधित शासकीय मेडिकल कॉलेजों और प्रशासनिक अधिकारियों ने विद्यार्थियों के दसवीं, बारहवीं, नीट स्कोरकार्ड और एमबीबीएस के सभी वर्षों की मूल अंकतालिकाओं समेत समस्त प्राथमिक शैक्षणिक दस्तावेज अपने कब्जे में रख लिए हैं।
डॉक्टरों का तर्क है कि जब नीति के प्रावधान केवल डिग्री रोकने की अनुमति देते हैं, तो उनके अन्य मूल प्रमाण-पत्र किस आधार पर रोके जा रहे हैं। दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण वे किसी भी अन्य शैक्षणिक या प्रशासनिक प्रक्रिया में भाग लेने से पूरी तरह वंचित हो गए हैं। कई बार पत्राचार करने के बावजूद चिकित्सा शिक्षा प्रशासन की ओर से इस विषय पर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
| क्र.सं. | विवरण विषय | वर्तमान स्थिति / तथ्य |
|---|---|---|
| 1 | प्रभावित कुल डॉक्टर | लगभग 600 (जिनमें से 300+ NEET-PG पास) |
| 2 | एमबीबीएस पूर्ण होने का समय | फरवरी 2026 (आठ महीने से सेवा/दस्तावेज लंबित) |
| 3 | लागू नीति | हरियाणा राज्य मेडिकल बॉन्ड पॉलिसी 2020 (संशोधित 2022) |
| 4 | मुख्य समस्या | मूल शैक्षणिक दस्तावेजों का न मिलना एवं पीजी काउंसलिंग में अड़चन |
| 5 | संबंधित प्रशासनिक निकाय | DMER हरियाणा एवं पं. भगवत दयाल शर्मा UHS रोहतक |
अधिकारियों के चक्कर काटने के बाद भी नहीं निकला समाधान
एमबीबीएस पासआउट डॉक्टरों का कहना है कि उन्होंने अपनी समस्या के निवारण के लिए चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशालय (DMER) हरियाणा, पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, रोहतक के कुलसचिव तथा अपने-अपने मेडिकल कॉलेजों के निदेशकों और डीन को दर्जनों ज्ञापन प्रस्तुत किए हैं। इसके अलावा आधिकारिक ईमेल के माध्यम से भी स्थिति से अवगत कराया जा चुका है।
निरंतर प्रशासनिक उपेक्षा और आधिकारिक स्तर पर ठोस आश्वासन न मिलने से क्षुब्ध होकर अब युवा डॉक्टरों ने कानूनी कदम उठाने का मन बना लिया है। डॉक्टरों का प्रतिनिधिमंडल राज्य सरकार, डीएमईआर और रोहतक विश्वविद्यालय प्रशासन को औपचारिक लीगल नोटिस भेजने की प्रक्रिया में है, जिसके बाद पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जाएगी।
"सरकार ने बॉन्ड नीति लागू करते समय यह आश्वासन दिया था कि किसी भी मेधावी छात्र की उच्च शिक्षा में बाधा उत्पन्न नहीं होने दी जाएगी। आठ महीने से हम न तो रोजगार पा सके हैं और न ही अपने मूल दस्तावेज। NEET-PG पास करने के बाद भी यदि हम काउंसलिंग से बाहर होते हैं, तो यह हमारी वर्षों की मेहनत पर पानी फेरने जैसा होगा।"
- पीड़ित एमबीबीएस डॉक्टर प्रतिनिधिमंडल, हरियाणा
करियर पर अनिश्चितता और उच्च न्यायालय का रुख करने की तैयारी
चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि स्नातकोत्तर स्तर पर डॉक्टरों की काउंसलिंग प्रक्रिया समयबद्ध होती है। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर सत्यापन अधिकारी के समक्ष मूल प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किए जाते, तो अभ्यर्थी का आवंटन रद्द कर दिया जाता है। इस प्रशासनिक विफलता के चलते 300 से अधिक युवा चिकित्सकों का करियर दांव पर लगा हुआ है।
डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि यदि प्रशासन अतिशीघ्र मध्यस्थता करते हुए प्रोविजनल एनओसी अथवा मूल दस्तावेज जारी करने की व्यवस्था नहीं करता है, तो वे अपनी मांगों को लेकर सड़क से लेकर अदालत तक संघर्ष करने को विवश होंगे। फिलहाल, पूरे प्रदेश के चिकित्सा हलकों में इस गतिरोध को लेकर भारी निराशा और रोष व्याप्त है।




