पानीपत जिले में आज शरद पूर्णिमा का पावन पर्व अत्यंत धार्मिक उल्लास और वैदिक विधि-विधान के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक के मंदिरों और घरों में व्यापक स्तर पर तैयारियां की गई हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार कोजागरी पूर्णिमा के रूप में विख्यात इस तिथि का सनातन संस्कृति में विशिष्ट आध्यात्मिक स्थान है। जिलावासियों में इस रात को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है, क्योंकि इस बार कई दुर्लभ ज्योतिषीय योगों का एक साथ मिलन हो रहा है जो इसे और अधिक फलदायी बना रहा है।
स्थानीय जानकारों और ज्योतिषविदों के अनुसार, इस बार की शरद पूर्णिमा पर वृद्धि योग, हर्षण योग के साथ-साथ अत्यंत शुभ माने जाने वाला गजकेसरी योग भी घटित हो रहा है। इसके अलावा तुला राशि में सूर्य, बुध और शुक्र की युति से लक्ष्मी-नारायण योग का प्रभाव भी बना हुआ है। इन सभी ग्रहों की स्थिति को जनसामान्य के जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का माध्यम माना जा रहा है। पानीपत के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर आज शाम से ही भजन-कीर्तन और विशेष महाआरती के आयोजनों की रूपरेखा तैयार कर ली गई है।
समुद्र मंथन से जुड़ी है पौराणिक मान्यता और महारास की परंपरा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की यही वह पवित्र तिथि है जब समुद्र मंथन के दौरान माता महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसी मान्यता के आधार पर इस रात्रि को मां लक्ष्मी के पूजन का विशेष विधान है ताकि साधकों को कभी भी आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े। इसके अतिरिक्त, इस पावन रात्रि का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की अनंत लीलाओं से भी जुड़ा हुआ है। बृज क्षेत्र की तर्ज पर पानीपत के कई इलाकों में भी आज के दिन को भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के महारास की स्मृति के रूप में श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।
इस रात को लेकर एक अन्य अत्यंत प्रसिद्ध लोक मान्यता यह है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है। इसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्वास के तहत दूध और चावल से तैयार की गई पारंपरिक खीर को खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रोशनी में रखने की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया जाता है। अगले दिन इस प्रसाद को ग्रहण करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
| पर्व का विवरण | समय व तिथि जानकारी |
|---|---|
| पूर्णिमा तिथि आरंभ | 25 अक्तूबर, सुबह 11:55 बजे |
| पूर्णिमा तिथि समापन | 26 अक्तूबर, सुबह 09:41 बजे |
| खीर रखने का श्रेष्ठ समय | रात 8:30 बजे से मध्यरात्रि तक |
| सर्वार्थ सिद्धि योग समय | 25 अक्तूबर शाम 7:22 बजे से प्रारंभ |
ज्योतिषीय दृष्टिकोण और मंदिरों में उमड़ने वाली भीड़
स्थानीय मंदिरों के पुजारियों और धार्मिक विद्वानों ने जानकारी देते हुए बताया कि चूंकि इस बार पूर्णिमा तिथि का रात्रि व्यापम 25 अक्तूबर को बन रहा है, इसलिए मुख्य पूजा और चंद्र दर्शन आज की रात ही किए जाएंगे। जबकि अगले दिन यानी 26 अक्तूबर को सुबह स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व रहेगा। पानीपत के प्राचीन देवी मंदिर, संकट मोचन हनुमान मंदिर और सनातन धर्म मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने की संभावना है। आयोजकों द्वारा मंदिर परिसरों में विशेष रोश्नी और साफ-सफाई की व्यवस्था की गई है ताकि आने वाले भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
आध्यात्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ इस रात्रि को जागरण करने का भी बड़ा महात्म्य माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जो जातक रातभर जागकर मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करते हैं, उनके घरों में मां का स्थाई वास होता है। पानीपत के शहरी और ग्रामीण आंचल में महिलाएं अपने-अपने घरों के आंगन को खूबसूरत रंगोलियों से सजाकर मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियां कर रही हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी में इस पर्व को लेकर पारंपरिक उत्साह जीवंत रूप में दिखाई दे रहा है।
"शरद पूर्णिमा पर बन रहे ग्रहों के दुर्लभ योग साधकों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक समृद्धि के द्वार खोलते हैं। इस रात चंद्र दर्शन और खीर का सेवन स्वास्थ्य व चेतना दोनों को ऊर्जावान बनाता है।" - स्थानीय धार्मिक मर्मज्ञ
पानीपत के बाजारों और जनजीवन पर पर्व का प्रभाव
इस पर्व के आगमन से पानीपत के स्थानीय बाजारों में भी खासी रौनक देखने को मिल रही है। दूध, मेवा, चीनी और बर्तन बाजारों में आज सुबह से ही खरीदारों की भीड़ लगी रही। व्यापारी वर्ग के लिए भी यह उत्सव व्यावसायिक दृष्टि से काफी उत्साहजनक साबित हो रहा है। लोग पारंपरिक व्यंजनों की तैयारी के लिए आवश्यक सामग्रियों की खरीदारी में जुटे हैं। जिला प्रशासन और पुलिस विभाग द्वारा भी शांतिपूर्ण तरीके से पर्व संपन्न कराने के लिए शहर के प्रमुख बाजारों और मंदिरों के आसपास सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी भी नागरिक को आवागमन में परेशानी न हो।
कुल मिलाकर, पानीपत में शरद पूर्णिमा का यह पर्व आस्था, संस्कृति और उल्लास के त्रिवेणी संगम के रूप में मनाया जा रहा है। जहाँ एक तरफ लोग भौतिक सुख-सुविधाओं और समृद्धि की कामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का संदेश भी जन-जन तक पहुँच रहा है। चंद्रमा की धवल चांदनी के बीच गूंजते भजन और आस्था के दीप पानीपत की आबोहवा को पूरी तरह से भक्तिमय बना रहे हैं।




