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पानीपत

काेराेना महामारी में देवी मंदिर का चढ़ावा 3 लाख से 40 हजार पर सिमटा, समिति के सदस्य एकत्र कर 20 कर्मचारियों को हर माह 2.50 लाख रुपए दे रहे सैलरी

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काेराेना महामारी में देवी मंदिर का चढ़ावा 3 लाख से 40 हजार पर सिमटा, समिति के सदस्य एकत्र कर 20 कर्मचारियों को हर माह 2.50 लाख रुपए दे रहे सैलरी

जब से काेराेना महामारी आई है उसने हर सेक्टर काे प्रभावित किया है। इसका खासा असर धार्मिक संस्थानाें पर भी पड़ा। क्याेंकि काेराेना महामारी आने के कारण ही कई दशकाें बाद देश में लाॅकडाउन लगा था। मंदिराें में पूरी तरह से ताला लग गया। यानी मंदिराें में श्रद्धालुओं पर राेक लगी ताे जाहिर है उसके चढ़ावे में भी भारी कमी आई।

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Devi Mandir, Tehsil Camp - Temples in Panipat - Justdial

जिले के सबसे बड़े व सबसे पुराने मंदिर पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा क्याेंकि देवी मंदिर में आम दिनाें में हर माह 3 से 4 लाख रुपए का चढ़ावा आता था, जाेकि अब घटकर महज 30 से 40 हजार तक सिमट चुका है। चढ़ावा नहीं आने से देवी मंदिर की अग्रवाल वैश्य पंचायत समिति ने मंदिर के 4 पुजारियाें सहित 20 कर्मचारियाें की सैलरी भी अपनी जेब से देनी पड़ रही है। समिति के सदस्य हर महीने एकत्र करके सभी कर्मचारियाें काे लाॅकडाउन से ही पूरी सैलरी देते आ रहे हैं। यहां तक कि लाॅकडाउन में राेजाना 2 हजार लाेगाें के लिए खाना मुहैया कराया गया था।

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नवरात्राें केे दान से पूरे साल का निकलता था खर्च, मंदिर में होते रहते थे डिवेलपमेंट कार्य

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पानीपत के देवी मंदिर में नवरात्राें के दाैरान राेजाना लाखाें लाेग दर्शन के लिए आते हैं, और कई लाखाें का चढ़ावा भी आता था। साल में आने वाले दाे बार नवरात्राें में ही देवी मंदिर में इतना दान मिलता था कि पूरे साल का खर्च निकलने के साथ-साथ मंदिर में डेवलमेंट के कार्य भी हाेते रहते थे। लेकिन इस साल 25 मार्च से नवरात्र शुरू हाे रहे थे, लेकिन 22 मार्च काे ही पूरे देश में लाॅकडाउन लग गया। 22 मार्च से 5 जून तक मंदिराें काे खाेलने पर राेक रही, यानी 74 दिनाें तक मंदिराें पर ताला लटका रहा। 6 जून से मंदिर काे खाेलने के आदेश दिए गए।

Goddess Temple of Panipat is unique example of religious architectural style

देवी मंदिर का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। देवी मंदिर का निर्माण 18वीं शाताब्दी में किया गया था। 18वीं शताब्दी के दौरान, मराठा इस क्षेत्र में सत्तारूढ़ थे, मराठा योद्धा सदाशिवराव भाऊ अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए यहां आये थे। सदाशिवराव भाऊ अफगान से आया अहमदशाह अब्दाली जोकि आक्रमणकारी था, उसके खिलाफ युद्ध के लिए यहा लगभग दो महीने रुके थे। ऐसा माना जाता है कि सदाशिवराव को लिए देवी की मूर्ति तालाब के किनारे मिली थी, तब सदाशिवराय ने यहां मंदिर बनाने का फैसला किया। देवी मंदिर में सभी त्योहार मनाए जाते है विशेष कर दुर्गा पूजा व नवरात्र के त्योहार पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

 

पहले राेजाना 1 हजार श्रद्धालु आते थे

देवी मंदिर के प्रधान काकू बंसल ने बताया कि देवी मंदिर ऐतिहासिक मंदिर है। मंदिर में काेराेना से पहले आम दिनाें में 1 हजार श्रद्धालु राेजाना आते थे और अब मात्र 100 से 150 श्रद्धालु ही मंदिर आते हैं। त्याेहारी सीजन पर श्रद्धालुओं की संख्या 2 से 3 हजार पहुंच जाती है, लेकिन सबसे ज्यादा श्रद्धालु देवी माता के दिनाें यानी नवरात्राें में आते हैं। नवरात्राें में राेजाना लाखाें तक श्रद्धालु आते हैं। इसमें कई राज्याें से श्रद्धालु आते हैं।

 

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