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टोल टैक्स से छूट एक तरह का स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है

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आप चुपचाप टोल चुकाते हैं और नेताजी और बाबू फुर्र से कार से उड़ जाते हैं

कभी लाल बत्ती वीआईपी कल्चर का प्रतीक थी जिस पर गुजरे सालों में लगाम तो लगा है लेकिन टोल प्लाजा पर एक अलग ही तरह का वीआईपी कल्चर दिख रहा है। टोल टैक्स से छूट वाली लिस्ट फैलती ही जा रही है। नेता से लेकर बाबू तक टोल प्लाजा पर फुर्र से बिना टोल चुकाए निकल जाते हैं। कई बार तो निजी यात्रा के दौरान भी छूट लेते हैं जो नियमों के खिलाफ है। वीआईपी सिन्ड्रोम से ग्रस्त कुछ नेता तो टोल चुकाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। इस तरह की खबरें आती ही रहती हैं कि फलां नेता या उनके समर्थक ने टोल प्लाजा पर बवाल काटा, टोलकर्मियों से मारपीट की, वजह सिर्फ यह कि उन्हें टोल चुकाना बेइज्जती जैसा लगता है।

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अभी हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने टोल टैक्स में छूट को लेकर कहा था कि वह फोकट वाले कल्चर का समर्थन नहीं करते। दरअसल, पिछले महीने वह मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेसवे की प्रगति का जायजा लेने पहुंचे थे। तब उनसे पूछा गया कि टोल बूथों के लिए पत्रकारों को मुफ्त पास क्यों नहीं दिए जाते। इसी के जवाब में उन्होंने कहा कि मैं फोकट क्लास का समर्थक नहीं हूं।

गडकरी का यह जवाब दिल जीत लेने वाला है लेकिन सवाल यह भी है कि क्या मंत्री खुद टोल चुकाते हैं? मंत्री जी को छोड़िए, क्या उनके मंत्रालय के टॉप अफसर टोल चुकाते हैं? इसका जवाब है नहीं। फिर यह फोकट वाला कल्चर नहीं तो और क्या है? अक्सर देखा जाता है कि मंत्रालयों के बाबू अपनी निजी यात्राओं तक पर टोल नहीं चुकाते। अगर फोकट वाली संस्कृति को वाकई हटाना है तो टोल टैक्स से छूट वाली लिस्ट घटने के बजाय बढ़ क्यों रही है?

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2000 से 2010 तक टोल टैक्स से छूट वाली सिर्फ 9 मुख्य कैटिगरी थीं। इनमें डिफेंस, पुलिस, एम्बुलेंस, दमकल की गाड़ियां, फ्यूनरल वैन, केंद्र और राज्य सरकार के चुनिंदा अधिकारी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद और विधायक शामिल थे। अब छूट वाली श्रेणियों की तादाद 25 हो चुकी है। इसमें मैजिस्ट्रेट, सेक्रटरी, तमाम मंत्रालयों के अधिकारी, NHAI के अधिकारियों समेत राज्य सरकारों के अधिकारी शामिल हैं।

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आम आदमी टोल टैक्स चुकाता रहे लेकिन नेता-बाबू टोल प्लाजा से फुर्र से उड़ जाए, यह कहां तक उचित है। सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए कई तरह के टैक्स का भुगतान करना पड़ता है। 1958 से मोटर वीइकल टैक्स लागू है। उसी साल से पैसेंजर और गुड्स टैक्स भी शुरू हुआ। 1996 से वन टाइम रोड टैक्स भी लगता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर अलग से सेस भी चुकाना पड़ता है। इन सबके बाद टोल प्लाजा पर टोल चुकाना होगा।

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आम आदमी के लिए टोल चुकाने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन टोल सिस्टम में पारदर्शिता की कमी का बोझ भी आम आदमी पर ही पड़ता है। टोल ऐनालिस्ट और ‘टोल एक झोल’ नाम की किताब लिखने वाले संजय शिरोडकर ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए लिखे एक लेख में टोल बूथों की अपारदर्शिता और टोल कलेक्शन की अंडररिपोर्टिंग का मुद्दा उठाया है। ज्यादातर भारतीय टोल बूथों को शक की निगाह से देखते हैं जिसके वाजिब कारण भी हैं।

टोल बूथ से गुजरने वाली गाड़ियों की संख्या कम करके दिखाना एक अलग ही तरह का भ्रष्टाचार है जिसकी सबसे ज्यादा मार आम आदमी पर ही पड़ता है। कई टोल बूथ रोड निर्माण की लागत को 5-7 साल में वसूल लेते हैं लेकिन अंडररिपोर्टिंग की वजह से 20 से ज्यादा सालों तक टोल टैक्स वसूलते रहते हैं। आरटीआई से मिले डेटा इस भ्रष्टाचार से पर्दा उठाते हैं। गाड़ियों की बिक्री के आंकड़ों से भी यह साफ झलकता है। पिछले कुछ सालों से गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन हर साल औसतन 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है लेकिन टोल चुकाने वाली गाड़ियों की संख्या या तो स्थिर है या कुछ मामलों में पिछले साल से भी कम है।

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