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मौके से गायब दिखे किसान आंदोलन के बड़े चेहरे, भीड़ इस कदर बेकाबू हो गई थी कि पुलिस की क्रेन और बस को छीन अपने साथ ले गई

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मौके से गायब दिखे किसान आंदोलन के बड़े चेहरे, भीड़ इस कदर बेकाबू हो गई थी कि पुलिस की क्रेन और बस को छीन अपने साथ ले गई

25 जनवरी को रात 2 बजे गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों के बीच पहुंचे। फिर 26 जनवरी की सुबह ट्रैक्टर परेड के साथ निकले और रात 8 बजे तक आईटीओ पर किसानों के काफिले के साथ रहे। किसानों की ट्रैक्टर परेड के साथ वे 18 घंटे रहे। इस दौरान कहां पर क्या-क्या हुआ? पढ़िए उन्हीं की जुबानी….

भीड़ वरिष्ठ किसान नेताओं के काबू में नहीं थी
गाजीपुर बॉर्डर की बात करते हैं। यहां शुरू से ही किसानों ने पुलिस के दिए रूट को फॉलो नहीं किया। किसान गाजीपुर बॉर्डर से बैरिकेड्स तोड़कर पांडव नगर, अक्षरधाम ब्रिज (नोएडा मोड़), इंद्रप्रस्थ, रेलवे ब्रिज रोड होते हुए आईटीओ पुल, आईटीओ पुल से आईटीओ चौक और फिर लाल किले की तरफ गए। रैली भी तय समय से काफी पहले शुरू हो गई। परेड की कमान युवाओं के हाथ में आ गई थी और तय बातों का लगातार उल्लंघन हो रहा था, लेकिन वरिष्ठ किसान नेताओं ने पुलिस को इस बात का कोई इनपुट नहीं दिया कि चीजें उनके हाथ से निकल चुकी हैं और भीड़ मनमाने तरीके से आगे बढ़ रही है।

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पुलिस ने पांडवनगर, आईटीओ पर जब किसानों को रोकने की कोशिश की तो भी कोई वरिष्ठ किसान नेता युवाओं को समझाने वाला नहीं था। ऐसे ही सूचनाए सिंघु बॉर्डर से भी आ रही थीं। वहां खुलेआम नारे लग रहे थे कि परेड तय रूट पर नहीं, रिंग रोड पर करेंगे, लेकिन वरिष्ठ नेताओं ने न तो इसे रोका और न ही पुलिस को इसकी सूचना दी। गाजीपुर बॉर्डर से निकली परेड में जो लोग किसानों के जत्थों के आगे थे, वे नए चेहरे थे, इनकी पुलिस के साथ कोई ट्यूनिंग नहीं थी। जब भीड़ हिंसक होने लगी तो मौके पर पुलिस अधिकारी किससे बातें करें, समझ नहीं पा रहे थे। किसान आंदोलन के जाने-पहचाने चेहरे मौके पर नजर ही नहीं आए।

गाजीपुर बॉर्डर के पास किसानों ने बैरिकेड तोड़ दिए। पुलिस की तरफ से लगाए गए कंटेनर को दूर खींच ले गए।
गाजीपुर बॉर्डर के पास किसानों ने बैरिकेड तोड़ दिए। पुलिस की तरफ से लगाए गए कंटेनर को दूर खींच ले गए।

पुलिस के पास संसाधन भी कम थे, गलतियां भी हुईं

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पुलिस एक समय इस कदर लाचार थी कि पांडवनगर में उसकी क्रेन को भीड़ अपने साथ लेकर चली गई। इसे करीब 3 किलोमीटर आगे ले जाकर छोड़ा। पुलिस दस्ते को लेकर आई बस को भी किसान साथ में लेकर चले गए। पांडवनगर में सिर्फ दो निहंग ने पुलिस के दर्जनों जवानों को दौड़ा लिया। तेज रफ्तार ट्रैक्टरों के आगे पुलिस कुछ नहीं कर पा रही थी।

पुलिस अधिकारी भी मान रहे थे कि इतनी बड़ी संख्या में ट्रैक्टरों को रोकने का दिल्ली पुलिस के पास ज्यादा अनुभव नहीं है। पुलिस से सबसे बड़ी गलती यह हुई कि ज्यादातर फोर्स को उन रूट्स पर तैनात किया गया, जहां से परेड निकलने की बात तय हुई थी। इसके अलावा गणतंत्र दिवस के समारोह में पुलिस का बड़ा हिस्सा तैनात था। इसका नतीजा यह हुआ कि जिन पॉइंट्स पर किसानों ने रूट तोड़ा, वहां पुलिस उन्हें नहीं रोक पाई, क्योंकि भीड़ हजारों की संख्या में थी और फोर्स कम थी। जब तक दूसरी जगहों से पुलिस दस्ते आए, तब तक कई जगह बवाल हो चुका था।

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25 जनवरी को तीनों बॉर्डर पर जो माहौल था, उससे साफ लग रहा था कि युवा रूट तोड़कर दिल्ली में घुसने की कोशिश करेंगे, लेकिन पुलिस की ओर से ऐसी स्थिति से निपटने की तैयारी बहुत कमजोर थी। पुलिस ने गाजीपुर से रूट तोड़कर निकले किसानों को पांडवनगर में रोकने की कोशिश की, लेकिन भीड़ के सामने पुलिस की टीम ज्यादा देर नहीं ठहर पाई। अगर पांडवनगर में पर्याप्त फोर्स होती तो किसानों को वहां रोका जा सकता था। अगर किसान आईटीओ नहीं पहुंच पाते तो वहां जो भारी हिंसा और तोड़फोड़ हुई, वह न होती।

गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। लेकिन, किसान फिर भी आगे बढ़ते गए।
गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। लेकिन, किसान फिर भी आगे बढ़ते गए।

किसानों से भिडंत में पुलिस के पास संख्या के साथ-साथ संसाधनों की भी कमी साफ नजर आई। सीमेंट के हैवी बैरिकेड्स की संख्या कम थी। जो बैरिकेड लगे थे, किसानों के ट्रैक्टरों को उन्हें तोड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। तेज रफ्तार से भागते ट्रैक्टरों को रोकने के लिए पुलिस की गाड़ियां नाकाफी थीं। हैवी कंटेनरों की संख्या भी पुलिस के पास कम थी। कुछ बैरिकेड पर इन्हें लगाया गया, लेकिन किसानों ने अपनी भारी क्रेनों से उन्हें हटा दिया।

 

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