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पॉल्यूशन से इनफर्टिलिटी: महिलाओं की ओवरी बीमार, तो पुरुषों में घटा स्पर्म काउंट

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30% यंग कपल्स के नहीं हो रहे बच्चे, महिलाओं की ओवरी बीमार, तो पुरुषों में घटा स्पर्म काउंट, प्रदूषण बन रहा कारण

  • नॉर्मल प्रेग्नेंसी हुई मुश्किल, तीन सालों में सबसे ज्यादा देखी गई इनफर्टिलिटी
  • ​​​​​5 लाख लगाकर भी दो से तीन साल में हो रहीं प्रेग्नेंट

रोजाना जहरीली हवा में सांस लेना आपके लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है, इसका अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि आज दिल्ली-एनसीआर जैसे अर्बन शहरों में यंग कपल्स नॉर्मल तरीके से बच्चा पैदा करने की स्थिति में नहीं हैं। जिन महिलाओं की 35 के बाद ओवरी में दिक्कत आती थी, अब 25 की उम्र में ही महिलाएं इनफर्टिलिटी की शिकार हो रही हैं। वहीं पुरुषों में स्पर्म काउंट बहुत तेजी से घट रहा है। इसका नुकसान इतना ज्यादा है कि आईयूआई और अन्य आर्टिफिशियल प्रेग्नेंसी का तरीका अपनाने पर भी इन्हें सफलता नहीं मिलती। ये हालात एक-दो कपल्स के साथ नहीं हैं बल्कि पिछले तीन सालों में दिल्ली-एनसीआर के करीब 30% कपल्स इनफर्टिलिटी से जूझ रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण पॉल्यूशन भी माना जा रहा है।

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पॉल्यूशन और इनफर्टिलिटी की परेशानी पर बात करते हुए दैनिक भास्कर की वुमन टीम ने फर्टिलिटी एक्सपर्ट और यंग कपल्स से बात की। पढ़िए, कैसे सालों तक दवाईयां खाकर बच्चे की कोशिश करते हैं इनफर्टिलिटी से जूझते कपल्स। लाखों रुपये खर्च कर आईयूआई और आईवीएफ ट्रीटमेंट कराने पर भी डिलीवरी तक रखना पड़ता है फूंक-फूंककर कदम।

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प्रदूषण बन रहा देश का मुद्दा, इसका निकालना होगा हल
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण की समस्या पर केंद्र सरकार को जल्द से जल्द उपाय निकालने के लिए कहा है। कोर्ट का कहना है कि प्रदूषण जिस तरह से बढ़ता जा रहा है इससे हमें किसी भी तरह से निजात पाना होगा। प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा बढ़ चुका है कि लोग हॉस्पिटल में लाइन लगाए खड़े रहते हैं। तुरंत पैदा हुए बच्चों को इनहेलिंग थेरेपी कराई जा रही है, हालत ये है कि कपल्स की फर्टिलिटी पर बुरा असर पड़ रहा है।

महिलाओं की ओवरी हुई बीमार, पुरुषों का स्पर्म काउंट घटा
भास्कर ने गुड़गांव की गायनाकोलॉजिस्ट डॉ विनीता यादव से बात की। वे बताती हैं प्रदूषण हमारे पूरे शरीर पर असर डालता है। फर्क सिर्फ इतना है कि जैसे ही सर्दियां आती हैं प्रदूषण से परेशान अस्थमा के मरीज अस्पताल पहुंचने लगते हैं। लेकिन लंबे समय तक प्रदूषित हवा लेने से हमारे रिप्रोडक्शन सिस्टम पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। लोग फर्टिलिटी की परेशानी झेलते हैं। वे बताती हैं कि प्रदूषण और फर्टिलिटी के विषय पर ज्यादा से ज्यादा रिसर्च करने की जरूरत है, लेकिन अबतक जितने भी शोध हुए हैं उसमें देखा गया है कि प्रदूषण चार तरीके से मनुष्य की फर्टिलिटी पर असर डालता है।

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पॉल्यूशन का फर्टिलिटी पर असर
1 – हार्मोनल डिसबैलेंस – एंडोक्राइन डिसऑर्डर होने से शरीर के हार्मोन में दिक्कत आने लगती है। पोल्यूटेंट्स यानी प्रदूषण के कड़ हमारी बॉडी में एस्ट्रोजन और एण्ड्रोजन के रिसेपटर्स पर जाके चिपक जाते हैं। इससे हार्मोन के रिलीज पर काफी फर्क पड़ता है।

2 – स्पर्म काउंट हुआ कम, एग पर पड़ रहा असर – प्रदूषण की वजह से इन्फ्लेमेशन बढ़ जाता है। महिलाओं की ओवरी और पुरुषों की टेस्टीज के अंदर गेमेटोजेनेसिस के प्रोडक्शन पर असर पड़ता है। स्पर्म और एग का प्रोडक्शन कम होने लगता है। पुरुषों में स्पर्म काउंट कम होने लगता है तो महिलाओं की ओवरी बीमार होने लगती है। एग फर्टाइल नहीं हो पाता।

3 – डीएनए में आ रही गड़बड़ी – प्रदूषण से जीनोटॉक्सिक इफेक्ट होता है। इसमें जीन्स के लेवल के ऊपर पोल्यूटेंट्स बुरा असर डालते हैं। पुरुषों में स्पर्म फ्रेगमेंटेशन टेस्ट कराया जाता है। इसमें देखा गया कि स्पर्म डीएनए सेग्मेंटशन में स्पर्म का डीएनए टुकड़ों में बट जाता है। जिन लोगों का डीएनए टूट जाता है वे फर्टिलिटी नहीं कर सकते। प्रदूषण जैसे-जैसे बढ़ता है, स्पर्म डीएनए सेगमेंटेशन भी ज्यादा हो जाता है। इसी के साथ स्पर्म के जीवित रहने की क्षमता कम होती जाती है।

4 – ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाते है प्रदूषण – प्रदूषण के कारण शरीर में आरओएस की संख्या बढ़ जाती है। रिएक्टिव ऑक्सिजन स्पीशीज (आरओएस) नामक केमिकल की मात्रा बढ़ने से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाता है। आरओएस बढ़ने से स्पर्म और एग का प्रोडक्शन खराब होता है।

दिल्ली की हवा में सांस लेना, 40 सिगरेट पीने के बराबर है
दिल्ली-एनसीआर के साथ देश के कई शहरों की हवा प्रदूषण के कारण जहरीली होती जा रही है। एयर क्वालिटी इंडेक्स 500 से ऊपर बना हुआ है। इस दमघोंटू हवा में सांस लेना उतना ही खतरनाक है जितना एक दिन में 40 सिगरेट पीना। डॉक्टर बताती हैं कि ये पहले ही प्रूफ हो चुका है कि स्मोकर्स को प्रेग्नेंसी में दिक्कत आती है। कई केस में लोग इनफर्टिलिटी की परेशानी भी झेलते हैं। अब क्योंकि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है तो यही परेशानी उन कपल्स में देखी जा रही हैं जिन्होंने कभी सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाया है। पुरुषों में इस कारण स्पर्म काउंट कम हो रहा है तो महिलाओं की ओवरी इससे बुरी तरह प्रभावित है।

आईवीएफ सेंटर्स पर लगाए जाते हैं एयर फिल्टर्स, ताकि सेफ रहे सैंपल
हवा का हमारे रिप्रोडक्शन सिस्टम में काफी इम्पोर्टेन्ट रोल है। जितने भी आईवीएफ सेंटर्स होते हैं वहां लैब्स में खासकर एयर फिल्टर लगाए जाते हैं ताकि सैंपल को क्लीन करके भेजा जाए। अगर हवा में नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ी होगी तो इम्पलांटेशन नहीं किया जा सकता। जब एयर क्वालिटी आईवीएफ पर प्रभाव डाल सकती है तो इसका असर उन लोगों पर जरूर पड़ता है, जो नॉर्मल तरीके से कंसीव करने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रग्नेंसी के बाद भी एयर पॉल्यूशन डालता है बुरा असर
अगर हम लगातार खतरनाक एयर क्वालिटी में रहते हैं तो इसका असर प्रेग्रेंसी पर भी जरूर पड़ता है। प्री-मैच्योर डिलीवरी, बच्चे का कम वजन होना और उनकी मौत के पीछे भी यही कारण निकलकर आए हैं।

30% कपल्स हो रहे इनफर्टिलिटी के शिकार
डॉ विनीता बताती हैं कि उनके क्लीनिक में जितनी भी महिलाएं आती थी उनमें से करीब 30% पेशेंट्स अब फर्टिलिटी की समस्या बताने लगे हैं। ये दिक्कत तीन से चार सालों में सबसे ज्यादा देखी गई है। खासकर अर्बन एरिया में इनफर्टिलिटी इतनी कॉमन प्रॉब्लम है कि हर चार में एक कपल इसका शिकार हो रहा है। ऐसे कपल्स को एक साल तक दवाईयां दी जाती हैं और न्यूट्रिशियस डाइट लेकर नॉर्मल कंसीव करने की सलाह देते हैं। इसमें भी सफलता नहीं मिलती तब कपल्स आईयूआई और आईवीएफ का रुख करते हैं।

35 के बाद की दिक्कतें अब 25 की उम्र में झेल रहीं महिलाएं
क्लाउड नाइन हॉस्पिटल की सीनियर फर्टिलिटी एंड आइवीएफ कंसल्टेंट डॉ पारुल अग्रवाल बताती हैं कि पॉल्यूशन से फर्टिलिटी पर कितना असर पड़ता है ये जांचने के लिए हमारे पास सीधा कोई टेस्ट तो नहीं है। हां, लेकिन एयर पॉल्यूशन फर्टिलिटी पर उसी तरह असर डालता है जैसे स्मोकिंग। दोनों ही केस में एक ही तरह की दिक्कत आती है। प्रदूषण बढ़ने से एक ट्रेंड ये भी देखा गया है कि जिन महिलाओं को 35 या 40 के उम्र में ओवरी और यूट्रस में जो दिक्कतें आती थी आज वही परेशानी 25 से 30 साल की महिलाएं झेल रही हैं। एग फर्टिलिटी के लिए बहुत कम उम्र में ही ओवरी नॉन-रिएक्टिव हो रही है। इसलिए यंग कपल्स अब ज्यादा संख्या में आईयूआई और आईवीएफ सेंटर्स जाने लगे हैं।

बच्चे की चाह में चार साल कराया इलाज
नोएडा सेक्टर 119 निवासी मोनिका चौधरी बताती हैं कि वे 2018 से बच्चे की प्लानिंग कर रहीं हैं। शुरुआत में एक साल नॉर्मल कंसीव करने की हर संभव कोशिश की, इसमें कामयाबी नहीं मिली तब डॉक्टर को दिखाया। फिर करीब एक साल तक दवाईयां खाकर मोनिका और उनके पति अनिरुद्ध इसी कोशिश में लगे रहे। जब नैचुरल तरीके काम नहीं आए तो उन्होंने सबसे पहले आईयूआई यानी इंट्रा यूटेरिन इनसेमिनेशन का तरीका अपनाया। जिसमें महिला के वजाइना में स्पर्म इंजेक्ट किया जाता है। दो बार उन्होंने ये तरीका अपनाया लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। आखिर में इसी साल उन्होंने आईवीएफ का रुख किया। अब उनकी प्रेग्नेंसी का चौथा महीना चल रहा है।

घर से नहीं निकलती बाहर, कमरे में लगाया है एयर प्यूरीफायर डॉक्टर ने मुझे प्रग्नेंसी पूरी होने तक फूंक-फूंक कर कदम रखने को कहा है। पिछले चार सालों से लगातार दवाईयां खा रही हूं, ये मेरे रूटीन में शामिल हो चुका है। डॉक्टर ने खास डाइट फॉलो करने के लिए कहा है, इसके अलावा मैं बाहर का कुछ नहीं खा सकती। प्रदूषण पर बात करते हुए मोनिका कहती हैं कि पॉल्यूशन से दिक्कत तो होती है। हम घर में तो एयर प्यूरीफायर लगा भी लें लेकिन घर से बाहर जाते ही जहरीली हवा का सामना करना पड़ता है। इसलिए कोशिश यही रहती है कि बहुत कम घर से बाहर निकलू।

टेस्ट नेगेटिव आने पर घंटों रोती थी मोनिका
मोनिका बताती हैं कि इनफर्टिलिटी की समस्या का सामना करने के लिए फिजिकल से साथ इमोशनल और फाइनेनशियल तौर पर मजबूत होना जरूरी है। चार साल में प्रेग्नेंसी की कोशिश में करीब पांच लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। जब भी टेस्ट में नेगेटिव रिजल्ट आता था तो हम दोनों ही घंटों रोते थे और फिर एक-दूसरे को मोटिवेट भी करते थे।

भारत में हर साल घट रहा फर्टिलिटी रेट
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की माने तो 2018 की स्टडी में देश में इनफर्टिलिटी रेट 16.8% दर्ज किया गया है। वहीं देश में फर्टिलिटी रेट हर साल घटता जा रहा है।

साल – फर्टिलिटी रेट – पिछले साल के मुकाबले गिरावट 2018 – 2.240 – 1.37% 2019 – 2.220 – 0.89% 2020 – 2.200 – 0.9% 2021 – 2.179 – 0.95%

 

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