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पानीपत

बैंक की नौकरी छोड़ बनाने लगा पकौड़े, करनाल की ये गली तक हो गई प्रसिद्ध

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बैंक की नौकरी छोड़ बनाने लगा पकौड़े, करनाल की ये गली तक हो गई प्रसिद्ध

 

यह बात 60 के दशक की है। तब करनाल शहर में पकौड़े बनाने वाले हलवाई गिनती के थे। उस समय पुराना शहर की रामगली में समोसे व पकौड़ों की एक छोटी सी दुकान खुली। देखते ही देखते ही इस दुकान के पकौड़े व समोसों का स्वाद पूरे शहर के लोग की जीभ पर चढ़ गया। इतने बरसों में इस दुकान के स्वाद की प्रसिद्धि इतनी फैली की दूसरे जिलों से भी लोग यहां आकर विशेष तौर पर पकौड़े व समोसे लेकर जाते हैं। खास बात यह है कि बैंक की नौकरी छोड़कर महेश भाटिया ने यह काम शुरू किया था। आज इस दुकान पर की गई मेहनत से उन्होंने अपने एक पुत्र को डाक्टर बनाया और एक को हैंडलूम का शोरूम खोलकर दिया। महेश भाटिया ने अपने साथ काम के लिए कई और कारीगर भी रख लिए हैं, लेकिन पकौड़ों, समोसों व ब्रैड पकाेड़े को तेल की कढ़ाई में डालकर उन्हें सेकने का काम वह खुद ही करते हैं।

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बैंक की नौकरी छोड़ बनाने लगा पकौड़े, करनाल की ये गली तक हो गई प्रसिद्ध

महेश भाटिया ने बताया कि युवापन में उन्होंने शहर के एक बैंक में नौकरी करनी शुरू कर दी थी। उन्होंने यह नौकरी छोड़कर रामगली में पकौड़े बनाने का काम शुरू कर दिया। 1964 में जब उन्होंने यह काम शुरू किया तो उस समय करनाल में कुछ जगहों पर ही पकौड़े बनाए जाते थे। तब उन्होंने सबसे पहले यह ठाना कि वह क्वालिटी के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। तब से से अब तक वह अपने इस संकल्प पर कायम है। इसी वजह से वह सब्जी व मसाले खरीदने के लिए कभी नौकरी को बाजार नहीं भेजते हैं। खुद ही मंडी में जाकर सब्जियां खरीदते हैं। मसाले घर पर ही कूटकर तैयार किए जाते हैं। यही वजह है कि उन्होंने लोगों ने बेहद प्यार दिया। आज भी लोग बरसों बाद आते हैं और बताते हैं कि वह कभी बचपन में यहां आकर समोसे खाते थे। वही स्वाद लेने वह दोबारा जब भी मौका मिलता है तो आते हैं।

 

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Source : Jagran

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