हरियाणा की राजनीति में बिजली वितरण के निजीकरण का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों के केंद्र में आ गया है। राज्य के बिजली निगमों में निजी कंपनियों के प्रवेश को लेकर चल रही सुगबुगाहट और उसके खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच अब राजनीतिक दल खुलकर आमने-सामने आ चुके हैं। विपक्षी नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाते हुए सरकार की मंशा पर संदेह जताया है। प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक मंचों तक इस नीति के दूरगामी परिणामों पर गहन चर्चा छिड़ गई है, जिससे आने वाले दिनों में यह एक बड़ा जनहित का मुद्दा बनता नजर आ रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में बिजली महकमे के कर्मचारियों और तकनीकी इंजीनियरों का लंबा संघर्ष मुख्य वजह बताया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि कर्मचारी संगठनों ने समय रहते कड़ा रुख इख्तियार न किया होता, तो स्थिति और अधिक पेचीदा हो सकती थी। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में इस योजना के विरोध में उठी आवाज़ों ने नीति निर्धारकों को अपने कदम पीछे खींचने पर विवश कर दिया है। हालांकि, राजनीतिक दल इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं और सरकार की नीतियों को जनविरोधी करार दे रहे हैं।
गुरुग्राम और नूंह के राजस्व का गणित और निजीकरण की कोशिशें
नियामक आयोग की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दलों की भूमिका
| मुद्दा | इनेलो का पक्ष / आरोप | वर्तमान स्थिति व मांग |
|---|---|---|
| बिजली निजीकरण | गुरुग्राम-नूंह में लाइसेंस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल | प्रस्ताव को पूरी तरह से रद्द करने की मांग |
| कांग्रेस की भूमिका | प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस विधायकों की चुप्पी | विपक्ष की निष्क्रियता पर निशाना |
| खाली पद | निगमों में 50 हजार में से 25 हजार पद खाली | तत्काल पक्की भर्तियां शुरू करने की मांग |
| राजस्व सुरक्षा | 9500 करोड़ के राजस्व वाले क्षेत्र को सौंपने का विरोध | सरकारी ढांचे को मजबूत करने पर जोर |
इनेलो के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री प्रो. संपत सिंह ने हिसार स्थित अपने आवास पर आयोजित एक विशेष पत्रकार वार्ता के दौरान इन तमाम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने दावा किया कि बिजली कर्मचारियों के भारी दबाव के चलते ही सरकार को फिलहाल अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उन्होंने आगे कहा कि गुरुग्राम और नूंह जैसे अति महत्वपूर्ण क्षेत्रों को जहां से दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम को सबसे अधिक लगभग 43 प्रतिशत यानी करीब साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, किसी निजी हाथों में सौंपना निगम की आर्थिक रीढ़ तोड़ने जैसा साबित हो सकता था।
नियामक आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जब सरकार इस नीति के पक्ष में नहीं थी, तो महज कुछ ही दिनों के भीतर लाइसेंस की औपचारिकताएं पूरी करने का प्रस्ताव कैसे तैयार हो गया। इसके साथ ही उन्होंने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जब वे खुद इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे और आपत्तियां दर्ज करा रहे थे, तब कांग्रेस के सभी 28 विधायक इस गंभीर विषय पर रहस्यमय चुप्पी साधे बैठे रहे। बाद में बयानबाजी करने से जनता सब समझती है कि संकट के समय किसने धरातल पर संघर्ष किया।
"यदि सबसे अधिक राजस्व देने वाले क्षेत्रों को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जाता, तो सरकारी बिजली निगम आर्थिक तंगी के गर्त में चले जाते। सरकार को समीक्षा के नाम पर मामला लटकाने की बजाय इस निजीकरण के प्रस्ताव को हमेशा के लिए दफन कर देना चाहिए।" - प्रो. संपत सिंह, वरिष्ठ नेता
बिजली निगमों में स्टाफ की कमी और स्थायी समाधान की मांग
प्रेसवार्ता के दौरान महकमे की अंदरूनी व्यवस्थाओं पर भी बड़ा प्रहार किया गया। आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि प्रदेश के बिजली निगमों में स्वीकृत 50 हजार पदों के मुकाबले लगभग आधे यानी 25 हजार पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं। कर्मचारियों की इस भारी कमी के कारण मौजूदा कार्यभार संभाल रहे कर्मियों पर मानसिक व शारीरिक दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ रहा है। पर्याप्त अमला न होने के कारण फॉल्ट ठीक करने में देरी और अशुद्ध बिजली आपूर्ति जैसी समस्याएं आम हो चली हैं।
इस दिशा में आगे का रास्ता सुझाते हुए श्रमिक संगठनों और विपक्षी नेताओं ने एक स्वर में मांग की है कि सरकार को बार-बार निजीकरण के रास्ते तलाशने की बजाय अपने मौजूदा ढांचे को मजबूत करना चाहिए। खाली पड़े पदों पर तत्काल प्रभाव से पक्की और पारदर्शी भर्तियां की जानी चाहिए ताकि युवाओं को रोजगार मिले और उपभोक्ताओं को निर्बाध व सस्ती बिजली मिल सके। प्रशासनिक स्तर पर यदि समय रहते इन मांगों पर गंभीरता से अमल नहीं किया गया, तो आने वाले समय में कर्मचारी एक बार फिर से बड़े आंदोलन का बिगुल बजाने से पीछे नहीं हटेंगे।




