हरियाणा में भूमि सुधार और प्रशासनिक सरलीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने दोहलीदारों को उनकी काबिज जमीन का मालिकाना हक देने की प्रक्रिया को और अधिक सुगम बना दिया है। अभी तक इस प्रक्रिया के तहत पात्र व्यक्तियों को जिला उपायुक्त यानी डीसी कार्यालय के चक्कर काटने पड़ते थे, जिससे आम जनता को विभिन्न प्रकार की व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसी समस्या के समाधान के रूप में अब प्रदेश सरकार ने मालिकाना हक स्वीकृत करने के अधिकार सीधे उपमंडल अधिकारियों यानी एसडीएम स्तर पर स्थानांतरित कर दिए हैं। इस व्यवस्था के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र परिवारों को अपने स्थानीय उपमंडल स्तर पर ही राहत मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
इस संपूर्ण नीतिगत बदलाव के पीछे मुख्य प्रशासनिक उद्देश्य जिला मुख्यालयों पर लगातार बढ़ रहे प्रशासनिक और फाइलों के बोझ को कम करना है। राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की वित्तायुक्त राजस्व एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा द्वारा इस संबंध में औपचारिक आदेश जारी किए जा चुके हैं। जारी किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार, वे सभी एसडीएम जो सरकार द्वारा राजस्व प्रथम श्रेणी के सहायक कलेक्टर के रूप में अधिसूचित हैं, अब इन मामलों की सुनवाई करने और मालिकाना हक के प्रमाण पत्र जारी करने के लिए पूर्ण रूप से सक्षम होंगे। इससे न केवल प्रशासनिक कसावट आएगी बल्कि मामलों के निस्तारण में लगने वाले समय में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।
दोहलीदार श्रेणी के अंतर्गत आने वाले पात्रों का दायरा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पारंपरिक भू-व्यवस्था के इतिहास पर नजर डालें तो दोहलीदार श्रेणी के अंतर्गत मुख्य रूप से वे लोग आते हैं जिन्हें ऐतिहासिक रूप से समाज सेवा, पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के एवज में दान स्वरूप भूमि प्रदान की जाती थी। इस विशेष श्रेणी में गरीब ब्राह्मण, पुजारी और पुरोहितों के साथ-साथ बुटीमार, भोंडेदार और मुकररीदार भी शामिल होते हैं। पुरानी व्यवस्था के अनुसार इन व्यक्तियों को इन भूखंडों पर खेती और काश्त करने का अधिकार तो प्राप्त होता था, परंतु कानूनी तौर पर जमीन का स्वामित्व पंचायत या मूल व्यवस्था के पास ही सुरक्षित रहता था। समय के साथ इन काबिज परिवारों को उनके अधिकारों से जोड़ने के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा कल्याणकारी नीतियां बनाई गईं, जिसके तहत पिछले दो दशकों से अधिक समय से इन जमीनों पर काबिज लोगों को मालिकाना हक देने का प्रावधान किया गया है।
इस प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के कार्यकाल के दौरान लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय की अहम भूमिका रही है। करनाल में आयोजित एक राज्यस्तरीय महाकुंभ के दौरान हजारों एकड़ भूमि का मालिकाना हक दोहलीदारों को देने की विधिवत घोषणा की गई थी। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया था कि इस प्रकार की दान स्वरूप प्राप्त भूमि पर मालिकाना हक मिलने के बाद भी इसे खुले बाजार में खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है, ताकि इस जनकल्याणकारी नीति का मूल उद्देश्य यानी जरूरतमंद परिवारों को आश्रय और आजीविका की सुरक्षा देना सुरक्षित रह सके। अब वर्तमान नायब सैनी सरकार द्वारा इन अधिकारों को सीधे एसडीएम स्तर तक विकेंद्रीकृत करने से इन पुरानी घोषणाओं और नीतियों का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन बेहद तेज और पारदर्शी हो गया है।
| प्रशासनिक पहलू | पूर्व की व्यवस्था | संशोधित नई व्यवस्था |
|---|---|---|
| सक्षम प्राधिकारी अधिकारी | जिला उपायुक्त (DC) कार्यालय | उपमंडल अधिकारी (SDM / सहायक कलेक्टर प्रथम श्रेणी) |
| कार्रवाई का दायरा | राज्य के सभी पात्र जिले | संबंधित उपमंडल मुख्यालय |
| पात्र श्रेणियां | दोहलीदार, बुटीमार, भोंडेदार, मुकररीदार | दोहलीदार, बुटीमार, भोंडेदार, मुकररीदार |
| शर्तें | न्यूनतम 20 वर्ष काबिज होना अनिवार्य | न्यूनतम 20 वर्ष काबिज होना अनिवार्य |
राजस्व विभाग के नए निर्देशों के अनुसार, जो भी पात्र परिवार पिछले दो दशकों या उससे अधिक समय से इस प्रकार की भूमि पर लगातार काबिज चले आ रहे हैं, वे अब सीधे अपने क्षेत्र के एसडीएम न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर सकेंगे। आवेदन प्राप्त होने के बाद उपमंडल स्तर पर ही राजस्व रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाएगा और नियमानुसार मालिकाना हक की औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी। अधिकारियों का मानना है कि विकेंद्रीकरण की इस प्रक्रिया से जनता का अनावश्यक उत्पीड़न रुकेगा और फाइलों का मूवमेंट तेज गति से होगा।
"हरियाणा सरकार ने प्रशासनिक सरलीकरण के तहत दोहलीदारों को जमीन का मालिकाना हक देने की शक्तियां एसडीएम को सौंप दी हैं। राजस्व विभाग के इन नए आदेशों से जनता को अब जिला मुख्यालयों के अनावश्यक चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे और उनके कार्य स्थानीय स्तर पर ही तेजी से पूरे होंगे।" - प्रशासनिक प्रवक्ता, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग, हरियाणा
नागरिकों पर प्रभाव और आगामी प्रशासनिक अनुपालन
इस प्रशासनिक फेरबदल का सीधा और सकारात्मक प्रभाव ग्रामीण अंचल के उन हजारों परिवारों पर पड़ेगा जो लंबे समय से अपनी जमीनी हक की फाइलों को लेकर जिला मुख्यालयों के चक्कर काट रहे थे। विशेषकर गरीब पुजारियों, पुरोहितों और पारंपरिक रूप से काश्त करने वाले छोटे तबकों को अब अपने ही उपमंडल क्षेत्र में न्याय और प्रशासनिक स्वीकृति मिलने से बड़ी राहत महसूस हो रही है। जानकारों का मानना है कि सत्ता के विकेंद्रीकरण का यह निर्णय जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को और अधिक मजबूत करता है क्योंकि आम आदमी की पहुंच अब प्रशासनिक तंत्र तक और अधिक सुगम हो गई है।
आगामी दिनों में सभी जिलों के जिला उपायुक्तों द्वारा अपने-अपने अधीन आने वाले उपमंडल अधिकारियों को इन नए दिशा-निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। राजस्व विभाग की ओर से यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि लंबित पड़े पुराने मामलों को भी प्राथमिकता के आधार पर नए सक्षम अधिकारियों यानी एसडीएम के समक्ष स्थानांतरित किया जाए ताकि बिना किसी अतिरिक्त विलंब के पात्र नागरिकों को उनकी जमीनों के मालिकाना दस्तावेज सौंपे जा सकें।




