पानीपत जिले के कृषि वर्ग में इन दिनों सरकारी नीतियों और प्रशासनिक सुस्ती के खिलाफ गंभीर असंतोष पनपता हुआ नजर आ रहा है। मंगलवार को स्थानीय स्तर पर किसानों का सब्र उस वक्त जवाब दे गया, जब लंबे समय से चली आ रही उनकी दो प्रमुख आर्थिक मांगों पर कोई संतोषजनक सुनवाई नहीं हुई। अन्नदाताओं ने अपनी लंबित समस्याओं के समाधान के लिए पहले स्थानीय फ्लाईओवर के नीचे विरोध दर्ज कराया और उसके बाद विशाल पैदल मार्च निकालते हुए जिला सचिवालय परिसर में प्रवेश किया। प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए किसानों ने सचिवालय के प्रांगण में ही अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है।
इस विरोध प्रदर्शन के केंद्र में मुख्य रूप से दो बड़ी समस्याएं हैं, जिनका सामना ग्रामीण अंचल के किसान रोजाना कर रहे हैं। किसानों का साफ तौर पर आरोप है कि मंडियों में भारी मात्रा में पीआर धान की फसल डंप पड़ी हुई है, लेकिन खरीद के बावजूद उसका उठान नहीं किया जा रहा है। इस व्यवस्थागत विफलता के कारण किसानों की आजीविका और उनकी उपज का भुगतान पूरी तरह से अटक गया है। इसके अलावा, खेतों के बीचों-बीच से गुजरने वाली हाईटेंशन बिजली की लाइनों के लिए तय नियमों के तहत मुआवजा न मिलने से भी किसानों में गहरा रोष व्याप्त है। अन्नदाताओं ने दो दिन तक लगातार इसी स्थान पर डटे रहने का संकल्प लिया है।
किसानों का आक्रोश: धान का उठान अटका और मुआवजे की राह ताक रहे 400 परिवार
इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे प्रमुख किसान नेता दिलबाग बिंझौल ने मीडिया और प्रशासन के सामने जमीनी हकीकत को विस्तार से रखा। उनके मुताबिक, हाईटेंशन बिजली लाइनों के मुआवजे का पेच जिले के करीब 12 गांवों के लगभग 400 किसानों के लिए गले की फांस बन चुका है। स्थिति यह है कि पावर कॉर्पोरेशन द्वारा किसानों के खेतों में हाईटेंशन लाइन के खंभे तो खड़े कर दिए गए हैं, लेकिन अभी तक अंतिम तार नहीं खींचे जा सके हैं। प्रभावित किसानों की मांग है कि उन्हें सर्किल रेट या बाजार मूल्य के तय सरकारी मानकों के अनुसार उनकी जमीन का पूरा मुआवजा दिया जाए, ताकि उन्हें अपनी ही जमीन पर हो रहे नुकसान की भरपाई मिल सके।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती मंडियों में पीआर धान के उठान में आ रही भीषण देरी की है। किसानों का कहना है कि जब तक फसल मंडियों से उठेगी नहीं, तब तक आढ़तियों और सरकारी एजेंसियों द्वारा उनके बैंक खातों में भुगतान की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। समय पर पेमेंट न मिलने से किसानों के सामने रबी सीजन की अगली फसल की बिजाई, खाद-बीज का इंतजाम करने के साथ-साथ अपने घरेलू और पारिवारिक खर्चों को चलाना मुश्किल हो गया है। धान और बिजली के इन दोहरे संकटों ने किसानों को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया है, जिसके चलते उन्हें मजबूरन सड़कों पर उतरना पड़ा है।
| किसान आंदोलन के मुख्य बिंदु | विवरण व स्थिति |
|---|---|
| प्रभावित क्षेत्र | नैन, भाऊपुर, कालखा, भादड़, खुखराना, जाटल, सुनौता, नोहरा, फरीदपुर, रामगढ़ समेत 12 गांव |
| प्रमुख मांगें | पीआर धान का तत्काल उठान, बकाया भुगतान और हाईटेंशन लाइन का मुआवजा |
| प्रभावित किसान | लगभग 400 किसान परिवार |
| आंदोलन का स्वरूप | जिला सचिवालय परिसर में दो दिवसीय धरना और पैदल मार्च |
अधिकारियों और प्रशासनिक अमले की भूमिका पर सवाल
किसानों के इस उग्र प्रदर्शन के बाद जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। मंडियों में उठान प्रक्रिया की मॉनिटरिंग कर रहे अधिकारियों और खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के सुस्त रवैये के कारण अन्नदाताओं को दर-दर की ठोकरें खाने पड़ रही हैं। हालांकि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम करते हुए सचिवालय परिसर के मुख्य द्वारों पर बैरिकेडिंग कर दी है ताकि स्थिति कानून व्यवस्था के दायरे से बाहर न जाए, लेकिन अब तक किसी भी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने मौके पर आकर किसानों को लिखित आश्वासन नहीं दिया है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, बिजली निगम और कृषि विपणन बोर्ड के अधिकारी इस पूरे मामले की अंदरखाने समीक्षा कर रहे हैं। हाईटेंशन लाइनों के मुआवजे के मामलों में तकनीकी अड़चनों का हवाला दिया जा रहा है, जबकि धान उठान के मामले में ट्रांसपोर्टरों की कमी को मुख्य वजह बताया जा रहा है। बावजूद इसके, किसानों का मानना है कि ये केवल प्रशासनिक लीपापोती है और ज़मीन पर कोई ठोस कार्यवाई नजर नहीं आ रही है। अधिकारी लगातार किसानों से वार्ता करने के प्रयास में जुटे हैं ताकि सचिवालय के घेराव को समाप्त कराया जा सके।
"हाईटेंशन लाइन के मुआवजे का मामला हो या मंडियों में पीआर धान के उठान में देरी का संकट, किसानों का आर्थिक शोषण अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जब तक हमारी दोनों मांगों का लिखित और स्थायी समाधान नहीं होता, हमारा यह संघर्ष यूं ही जारी रहेगा और हम यहीं डटे रहेंगे।" - दिलबाग बिंझौल, किसान नेता
व्यापक जनजीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहराता प्रभाव
इस बड़े धरने और प्रदर्शन का सीधा असर पानीपत के स्थानीय जनजीवन और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ता दिख रहा है। जिला सचिवालय के बाहर किसानों के जमावड़े और मुख्य मार्गों पर पैदल मार्च के कारण यातायात व्यवस्था कुछ समय के लिए प्रभावित हुई, जिससे आवागमन करने वाले आम नागरिकों को भी असुविधा का सामना करना पड़ा। चूंकि पानीपत एक प्रमुख औद्योगिक और कृषि प्रधान जिला है, इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों के पास नकदी की कमी होने से स्थानीय बाजारों के खुदरा कारोबार में भी मंदी का रुख देखने को मिल रहा है।
व्यापारी वर्ग और आढ़ती संघ भी किसानों की इस समस्या को लेकर अंदरखाने चिंतित हैं क्योंकि धान का उठान न होने से उनकी गोदाम क्षमता और कमीशन भुगतान चक्र भी बाधित हो रहा है। यदि आने वाले कुछ दिनों में इस गतिरोध को समाप्त नहीं किया गया, तो यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप धारण कर सकता है, जिसका असर पूरे जिले की शांति और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।
आगे की प्रशासनिक कार्रवाई और आगामी रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम के बीच किसानों ने अपनी आगामी रणनीति का ऐलान कर दिया है। किसानों के मुताबिक, वे दो दिन तक शांतिपूर्ण ढंग से सचिवालय परिसर के भीतर ही अपना विरोध दर्ज कराएंगे। इसके बाद बुधवार दोपहर बाद एक उच्चस्तरीय किसान पंचायत बुलाई जाएगी। इस बैठक में प्रशासन द्वारा पिछले 48 घंटों में उठाए गए कदमों या किसी भी प्रकार के समझौते के प्रस्ताव पर गंभीरता से चर्चा की जाएगी। यदि तब तक सरकार या जिला प्रशासन की ओर से कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता है, तो पानीपत के किसान अपने आंदोलन को और अधिक तीव्र करने के लिए मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।




