पानीपत के औद्योगिक परिदृश्य में एक बार फिर कामगारों के अधिकारों और उनके हो रहे आर्थिक व सामाजिक शोषण का मामला गर्माता नजर आ रहा है। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) से जुड़ी इंडस्ट्रियल वर्कर यूनियन पानीपत के बैनर तले स्थानीय टेक्सटाइल इकाइयों में काम करने वाले मजदूरों के पक्ष में एक व्यापक जनसंपर्क अभियान का आगाज किया गया है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य कारखानों के भीतर प्रचलित कार्यप्रणाली और श्रम कानूनों के क्रियान्वयन की जमीनी सच्चाई को उजागर करना है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले श्रमिक वर्ग की दुर्दशा को सार्वजनिक किया जा सके।
शुक्रवार को चलाए गए इस विशेष अभियान के दौरान मजदूर प्रतिनिधियों ने औद्योगिक क्षेत्रों का दौरा कर श्रमिकों से सीधा संवाद स्थापित किया। इस दौरान सामने आए तथ्य प्रशासनिक व्यवस्था और औद्योगिक प्रबंधन दोनों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। स्थानीय वस्त्र उद्योग में मौजूदा समय में तीन लाख से ज्यादा कामगार अपनी आजीविका चला रहे हैं, लेकिन उनके श्रम अधिकारों की रक्षा के लिए बने नियमों का पालन धरातल पर न के बराबर दिखाई दे रहा है।
श्रम कानूनों की अनदेखी और काम के अमानवीय घंटे
यूनियन के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने केंद्र और प्रदेश सरकार की नीतियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए आरोप लगाया कि नए श्रम सुधारों और चार लेबर कोड के नाम पर कामगारों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को कमजोर किया जा रहा है। स्थिति यह है कि पानीपत की अधिकांश टेक्सटाइल इकाइयों में नौबत यहां तक पहुंच चुकी है कि लगभग 90 फीसदी मजदूरों के नाम तक आधिकारिक हाजिरी रजिस्टरों में दर्ज नहीं किए जाते हैं। इससे भविष्य में उन्हें किसी भी प्रकार का सामाजिक सुरक्षा लाभ, भविष्य निधि (PF) या कर्मचारी राज्य बीमा (ESIC) मिलने की संभावना नगण्य हो जाती है।
इसके अलावा, कामगारों से तयशुदा आठ घंटों के बजाय 12 से 14 घंटे तक लगातार कठिन परिश्रम कराया जा रहा है, और इसके एवज में उन्हें तय कानूनी मजदूरी भी नहीं दी जा रही है। पिछले महीनों में घोषित न्यूनतम वेतन संशोधन का लाभ भी जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन हथकरघा और टेक्सटाइल मजदूरों तक नहीं पहुंच पा रहा है। सुरक्षा मानकों की कमी के चलते ये कारखानों अक्सर दुर्घटनाओं का अखाड़ा बन चुके हैं, जहां आए दिन होने वाली अप्रिय घटनाएं मजदूरों की जान जोखिम में डाल रही हैं।
| मुद्दा | मौजूदा धरातलीय स्थिति | यूनियन की मुख्य मांग |
|---|---|---|
| पंजीकरण (हाजिरी) | 90% मजदूरों का नाम रजिस्टर में दर्ज नहीं | सभी कामगारों का लिखित रिकॉर्ड व आईकार्ड |
| दैनिक कार्य시간 | 12 से 14 घंटे तक कठोर कार्य | कानूनी रूप से निर्धारित 8 घंटे की शिफ्ट |
| वेतन भुगतान | बढ़े हुए न्यूनतम वेतन का लाभ नहीं | संशोधित न्यूनतम वेतन का पूर्ण भुगतान |
| औद्योगिक सुरक्षा | सुरक्षा उपकरणों का अभाव, हादसे | कारखानों में पुख्ता सुरक्षा और बीमा |
यूनियन नेताओं की दो टूक और भावी रणनीति
अभियान के दौरान सीटू के राज्य सचिव कामरेड सुनील दत्त ने प्रेसवार्ता और जनसंवाद में सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि देश के श्रम कानूनों को इस तरह से बदला जा रहा है जिससे उद्योगपतियों को खुली छूट मिल जाए और आम श्रमिक बंधुआ मजदूर की स्थिति में धकेला जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि समय रहते प्रशासनिक अधिकारियों ने श्रम नियमों का पालन कराने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए, तो असंतोष और अधिक उग्र रूप ले सकता है।
यूनियन के जिला प्रधान जयभगवान, कोषाध्यक्ष नवीन सपरा और महासचिव रामकुमार यादव ने संयुक्त रूप से बताया कि पानीपत का श्रमिक आज भी पेयजल, स्वास्थ्य, उचित आवास और गरिमापूर्ण जीवन जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। इन तमाम अनसुनी मांगों और शोषण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की कड़ी में पानीपत के मजदूर आगामी एक से तीन दिसंबर तक दिल्ली में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक संसद मार्च में भारी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
"सरकार द्वारा लाए जा रहे चार नए लेबर कोड मजदूरों के सभी अधिकारों को समाप्त कर उन्हें बंधुआ बनाने का षड्यंत्र हैं। पानीपत के टेक्सटाइल उद्योग में 90 प्रतिशत कामगारों का रिकॉर्ड तक दर्ज नहीं है और उनसे 14 घंटे तक अमानवीय काम लिया जा रहा है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।" - कामरेड सुनील दत्त, राज्य सचिव, सीटू
स्थानीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों पर संभावित प्रभाव
पानीपत का टेक्सटाइल उद्योग उत्तर भारत का एक प्रमुख वैश्विक निर्यात केंद्र माना जाता है, जहां कंबल, फर्निशिंग और यार्न का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। ऐसे में, यदि श्रमिक वर्ग और उद्योग प्रबंधन के बीच असंतोष इसी प्रकार बढ़ता रहा, तो इसका सीधा असर स्थानीय उत्पादन चक्र और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। श्रम संगठनों द्वारा चलाए जा रहे इन जागरूकता अभियानों से उद्यमियों पर भी नैतिक और कानूनी दबाव बनना शुरू हो गया है, जिससे आने वाले दिनों में जिला प्रशासन और श्रम विभाग को इस दिशा में कड़े निरीक्षण और मध्यस्थता की पहल करनी पड़ सकती है।



