हरियाणा प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में लंबी अवधि से सेवाएं दे रहे हजारों अतिथि अध्यापकों को राज्य सरकार की ओर से बड़ा झटका मिला है। पिछले करीब दो दशकों से अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे इन शिक्षकों को नियमित किए जाने की उम्मीदों पर उस वक्त पानी फेर दिया गया, जब उच्चाधिकारियों के साथ हुई एक अहम बैठक में सरकार ने दो टूक जवाब दे दिया कि मौजूदा नियमों के तहत इनकी सेवाओं को पक्का करने का कोई प्रावधान नहीं है। इस फैसले के बाद प्रदेशभर के अतिथि अध्यापकों में गहरी निराशा और रोष व्याप्त है, जो लंबे समय से अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए स्थायी नीति की मांग कर रहे थे।
यह पूरा घटनाक्रम तब सामने आया जब राजकीय अनुबंधित अध्यापक संघ का एक प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों को लेकर मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर से मुलाकात करने पहुंचा था। इस उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सरकार के रुख से यह पूरी तरह साफ हो गया कि नियमों की अड़चन के चलते इन शिक्षकों को नियमित करना संभव नहीं है। शिक्षा विभाग के स्तर पर पहले ही इस संबंध में स्पीकिंग ऑर्डर जारी किए जा चुके हैं, जिसके तहत अब कानूनी और प्रशासनिक रूप से अतिथि अध्यापकों की नियुक्ति को नियमित श्रेणी में नहीं बदला जा सकता है। हालांकि, सरकार ने इन्हें सेवा सुरक्षा का लाभ देते हुए 58 वर्ष की आयु तक नौकरी जारी रखने का आश्वासन अवश्य दिया है, लेकिन नियमितीकरण की मांग अधूरी रह गई है।
भर्ती नियमों की अड़चन और कानूनी पहलुओं का हवाला
शिक्षा विभाग का पक्ष रखते हुए अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इन शिक्षकों की नियुक्ति की मूल प्रक्रिया ही इस राह में सबसे बड़ा अवरोध है। वर्ष 2005 के दौरान विद्यालयों में अध्यापकों की तत्काल कमी को दूर करने के लिए इन्हें पीरियड के आधार पर और मानदेय पर रखा गया था। इस प्रक्रिया के दौरान न तो कोई केंद्रीकृत चयन प्रणाली अपनाई गई थी और न ही सरकारी भर्तियों में लागू होने वाले आरक्षण के नियमों का पालन किया गया था। विभाग का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के कई ऐसे निर्देश और फैसले आ चुके हैं, जिनके अनुसार केवल अनुभव के आधार पर किसी भी अस्थायी कर्मचारी को सीधा नियमित नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, अदालतें भी पूर्व में सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि इन शिक्षकों की सेवाएं नियमों के दायरे में रहकर नियमित नहीं की जा सकतीं।
दूसरी ओर, अतिथि अध्यापक संघ इस तर्क को सिरे से खारिज कर रहा है। संघ के नेताओं का कहना है कि उनकी नियुक्तियां पूरी तरह से योग्यता और मैरिट के आधार पर की गई थीं। इसके साथ ही उनका यह भी तर्क है कि जब कॉलेज कैडर के अतिथि प्राध्यापकों को पूर्व की नीतियों के तहत नियमित किया जा सकता है, तो स्कूल स्तर के शिक्षकों के साथ यह दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है। संघ के महासचिव भूपेंद्र सिंह ने कहा कि 16 और 18 जून 2014 की तीन साल की नियमितीकरण नीति में ऐसी कोई शर्त नहीं थी जो अतिथि अध्यापकों को अपात्र ठहराती हो। हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद शिक्षा विभाग द्वारा इस तरह का नकारात्मक निर्णय लिया जाना शिक्षकों के साथ अन्याय है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| प्रभावित कर्मचारियों की संख्या | प्रदेशभर में 10,557 गेस्ट टीचर्स |
| सेवा का कुल काल | पिछले 21 वर्षों सेवारत |
| मुख्य अधिकारी | मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर और शिक्षा सचिव विजय दहिया |
| संघ का अगला कदम | 14 और 15 नवंबर को कुरुक्षेत्र में बड़ा प्रदर्शन |
अध्यापक संघ का कड़ा रुख और आगामी विरोध प्रदर्शन की रणनीति
सरकार के इस नकारात्मक रुख से आहत होकर राजकीय अनुबंधित अध्यापक संघ ने अब आंदोलन का रास्ता अख्तियार कर लिया है। कुरुक्षेत्र के लघु सचिवालय के बाहर पिछले लंबे समय से क्रमिक धरने पर बैठे इन शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए बड़ा कदम उठाने का निर्णय लिया है। संघ की योजना के मुताबिक, आगामी 14 और 15 नवंबर को कुरुक्षेत्र में एक विशाल प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें प्रदेशभर से अतिथि अध्यापक जुटेंगे। इस दौरान शिक्षा विभाग द्वारा जारी किए गए उस स्पीकिंग ऑर्डर की प्रतियों को भी जलाया जाएगा, जिसमें उनकी सेवाएं नियमित करने से इनकार किया गया है। शिक्षकों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, तब तक उनका यह संघर्ष और अधिक तेज किया जाएगा।
विदित हो कि हरियाणा के सरकारी शिक्षा ढांचा में इन अतिथि अध्यापकों ने रीढ़ की हड्डी के रूप में काम किया है। जब-जब स्कूलों में शिक्षकों के भारी पद रिक्त रहे हैं, तब-तब इन्होंने ही कक्षाओं को संभाला है। ऐसे में 21 साल का लंबा अनुभव होने के बावजूद भविष्य अनिश्चित रहना इन परिवारों के लिए भारी मानसिक तनाव का कारण बन गया है। एक तरफ सरकार इन्हें 58 साल तक सेवा सुरक्षा देने की बात कह रही है, वहीं दूसरी तरफ नियमित वेतनमान, पेंशन और अन्य सेवा लाभों से वंचित रहना इन शिक्षकों को स्वीकार्य नहीं है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक बड़ा तूल पकड़ सकता है, क्योंकि शिक्षक संगठनों ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
"नियमों के दायरे में अतिथि अध्यापकों की सेवाएं नियमित करने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि, सेवा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते हुए इनकी नौकरियां 58 वर्ष की आयु तक सुरक्षित रखी जाएंगी, जिसे लेकर पहले ही स्पष्ट आदेश जारी किए जा चुके हैं।" - शिक्षा विभाग, हरियाणा सरकार
प्रशासनिक तैयारी और भविष्य की चुनौतियां
इस पूरे घटनाक्रम के बीच प्रशासनिक स्तर पर भी स्थिति पर पैनी नजर रखी जा रही है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यदि वे नियमों को ताक पर रखकर किसी भी संविदा कर्मचारी को नियमित करते हैं, तो इससे भविष्य में कानूनी पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं और अन्य विभागों के कच्चे कर्मचारी भी इसी प्रकार की मांगों को लेकर अदालतों का रुख कर सकते हैं। यही वजह है कि सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और अदालती फैसलों तथा नीतिगत नियमों का हवाला देकर अपने फैसले पर अडिग नजर आ रही है। हालांकि, चुनावी और सामाजिक दृष्टिकोण से इतने बड़े वर्ग की नाराजगी सरकार के लिए आगामी समय में एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
स्थानीय शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों के सुचारू संचालन के लिहाज से भी अतिथि अध्यापकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रदेश के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक के स्कूलों में आज भी हजारों की संख्या में ये शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यदि यह आंदोलन लंबा खिंचता है और शिक्षक हड़ताल या बड़े विरोध प्रदर्शनों का सहारा लेते हैं, तो इसका सीधा असर विद्यालयों की पठन-पाठन व्यवस्था पर पड़ना तय है। अब देखना यह होगा कि कुरुक्षेत्र में होने वाले आगामी प्रदर्शन के बाद क्या सरकार और शिक्षक संघ के बीच बातचीत का कोई नया दौर शुरू होता है या फिर यह गतिरोध कानूनी और सड़क की लड़ाई बनकर और अधिक गहराता है।




