पानीपत जिले के गांव अधमी स्थित मां शाकंभरी देवी मंदिर में रविवार को आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला। पावन पर्व और अवकाश के दिन यहां एक विशाल धार्मिक मेले का आयोजन किया गया, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। सुबह की पहली किरण के साथ ही माता के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा और मंदिर परिसर का माहौल पूरी तरह से भक्तिमय हो गया। महिलाओं और बच्चों में इस आयोजन को लेकर विशेष उत्साह नजर आया जो विभिन्न वाहनों व पैदल ही मंदिर की ओर बढ़ते दिखाई दिए।
मेले की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अलसुबह चार बजे ही मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही भक्तों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। कतारबद्ध होकर श्रद्धालुओं ने मां शाकंभरी देवी के दरबार में हाजिरी लगाई और अपनी तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान कई श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में विधिवत पूजा-अर्चना कर मन्नतें भी मांगीं। आस्था के इस महापर्व पर आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे, जिससे मेला प्रांगण खचाखच भर गया।
एक किलोमीटर के दायरे में सजा बाजार और उमड़ी भारी भीड़
मंदिर परिसर के मुख्य द्वार से लेकर लगभग एक किलोमीटर के दायरे तक भव्य मेले का विस्तार देखने को मिला। यहां सजी पारंपरिक खान-पान की दुकानों, खिलौनों के ठेलों और विभिन्न प्रकार के झूलों व खेल-तमाशों ने आगंतुकों का भरपूर मनोरंजन किया। विशेषकर बच्चों और युवाओं में इन झूलों और खेल गतिविधियों के प्रति भारी क्रेज देखा गया। खरीदारी के इस दौर में महिलाओं ने घरेलू सामान और पूजन सामग्री की जमकर खरीदारी की। दुकानदारों के चेहरों पर भी इस जबरदस्त भीड़ के चलते अच्छी ग्राहकी होने से साफ संतोष झलक रहा था।
दान-पुण्य की दृष्टि से भी यह दिन काफी महत्वपूर्ण रहा। मंदिर परिसर में पहुंचे श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा के अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र व धन का दान किया। सनातन संस्कृति की इस परंपरा ने एक बार फिर आपसी भाईचारे और सौहार्द का सुंदर संदेश दिया। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक सभी ने अनुशासन का परिचय देते हुए शांतिपूर्ण तरीके से दर्शन किए और मेले की व्यवस्थाओं का आनंद उठाया।
| मेले की मुख्य विशेषता | विवरण |
|---|---|
| आयोजन स्थल | मां शाकंभरी देवी मंदिर, गांव अधमी |
| मुख्य आकर्षण | विशाल धार्मिक मेला, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक उल्लास |
| श्रद्धालुओं का समय | तड़के 4:00 बजे से देर शाम तक |
| विशेष गतिविधियां | दर्शन, पूजन, खरीदारी और दान-पुण्य |
प्रशासनिक सतर्कता और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने के कारण कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे प्रशासन और मंदिर आयोजन समिति ने आपसी तालमेल से बखूबी निभाया। अप्रिय घटनाओं से निपटने और यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए पुलिस बल की चप्पे-चप्पे पर तैनाती की गई थी। वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए मंदिर से कुछ दूरी पर पार्किंग की विशेष व्यवस्था की गई थी ताकि मुख्य मार्ग पर जाम की स्थिति उत्पन्न न हो।
स्वयंसेवकों और आयोजकों ने बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों की सहायता के लिए जगह-जगह हेल्प डेस्क और पेयजल की व्यवस्थाएं की थीं। चिकित्सा आपातकाल से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग की एक टीम भी एम्बुलेंस के साथ मौके पर मुस्तैद नजर आई। आयोजकों ने बताया कि मेले को शांतिपूर्ण और सफलतापूर्वक संपन्न कराने में स्थानीय ग्रामीणों का भी अभूतपूर्व सहयोग प्राप्त हुआ।
माता शाकंभरी के आशीर्वाद से आयोजित इस वार्षिक मेले में हर वर्ष की भांति इस बार भी श्रद्धालुओं काार भारी सैलाब उमड़ा है। सभी के सहयोग से आयोजन शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। - स्थानीय आयोजक समिति
स्थानीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव
इस प्रकार के धार्मिक मेलों का आयोजन न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है, बल्कि स्थानीय आर्थिकी को भी एक नया संबल प्रदान करता है। गांव अधमी में लगे इस मेले से स्थानीय दुकानदारों, छोटे व्यापारियों और कारीगरों को अपनी आजीविका चलाने का बेहतरीन अवसर मिला। मेलों के माध्यम से हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर और लोक परंपराओं का भी संरक्षण होता है, जिससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।
देर शाम तक चले इस मेले के समापन के पश्चात भी श्रद्धालुओं के चेहरों पर मां के दर्शन की तृप्ति और अलौकिक आनंद साफ झलक रहा था। प्रशासनिक मुस्तैदी और जनता के अनुशासन के बल पर यह आयोजन पूरी तरह सफल रहा और इसने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि सामूहिक मेलजोल हमारी सामाजिक संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है।




