पानीपत जिले में बिगड़ती आबोहवा अब आम जनमानस के स्वास्थ्य पर भारी पड़ने लगी है। लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण और जहरीले धुएं के कणों के कारण सांस संबंधी बीमारियों ने विकराल रूप धारण करना शुरू कर दिया है। स्थिति यह है कि जिला नागरिक अस्पताल की ओपीडी में पिछले महज एक सप्ताह के भीतर ही क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और अस्थमा के लगभग 10 नए मामले दर्ज किए जा चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर श्वसन समस्या से केवल बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हो रहा है।
स्थानीय स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारियों के अनुसार, वातावरण में घुल रहे हानिकारक प्रदूषक तत्वों ने लोगों के श्वसन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। हवा की गुणवत्ता खराब होने से फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंचने में बाधा आ रही है, जिससे छाती में कफ जमने और सांस उखड़ने की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। अस्पताल पहुंचने वाले पीड़ितों में भारी घुटन और सीने में जकड़न जैसे गंभीर लक्षण साफ तौर पर देखे जा रहे हैं, जिसके चलते चिकित्सकों को तुरंत चिकित्सीय हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।
चिकित्सालय में बढ़ रहा मरीजों का दबाव, फिजियोथेरेपी से मिल रही राहत
जिला नागरिक अस्पताल के फिजियोथेरेपी विभाग में इन दिनों सांस के मरीजों की खासी भीड़ देखने को मिल रही है। सामान्य दिनों के मुकाबले पिछले कुछ हफ्तों में मरीजों के आने की रफ्तार कई गुना बढ़ गई है। अस्पताल की वरिष्ठ फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. नेहा बंसल ने बताया कि पहले जहां इस तरह के क्रॉनिक मरीज पूरे महीने में गिने-चुने ही आते थे, वहीं अब केवल सात दिनों के भीतर दहाई का आंकड़ा पार हो चुका है। फिजिशियन की देखरेख के साथ-साथ अब फिजियोथेरेपी के जरिए भी इन मरीजों को विशेष उपचार दिया जा रहा है ताकि उनकी सांस लेने की क्षमता को बेहतर बनाया जा सके।
चिकित्सकों की टीम मरीजों को दवाइयों के साथ-साथ छाती की विशेष कसरतों का अभ्यास करा रही है। इसके तहत कंधों और छाती से जुड़े व्यायाम करवाए जा रहे हैं, साथ ही गुब्बारे फुलाने और पानी में बुलबुले बनाने जैसी सांस की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन अभ्यासों का मुख्य उद्देश्य फेफड़ों में फंसे बलगम को बाहर निकालना और रेस्पिरेटरी मसल्स को मजबूत करना है ताकि मरीज को कृत्रिम या गंभीर आपातकालीन सहायता की नौबत से बचाया जा सके।
| बीमारी का प्रकार | एक सप्ताह के नए मामले | मुख्य लक्षण | सुझाए गए उपाय |
|---|---|---|---|
| सीओपीडी (COPD) | गंभीर श्रेणी के मामले | छाती में कफ जमना, सांस लेने में तकलीफ | नियमित फिजियोथेरेपी, मास्क का प्रयोग |
| अस्थमा (Asthma) | बढ़ती संख्या | सीने में जकड़न, घरघराहट, घुटन | सुबह की सैर से परहेज, पानी का छिड़काव |
चिकित्सकों की दो टूक: लापरवाही पड़ी भारी, बरतनी होगी कड़ी सावधानी
प्रदूषण के बढ़ते कहर को देखते हुए चिकित्सा विशेषज्ञों ने शहरवासियों को अत्यधिक सतर्कता बरतने की सख्त सलाह दी है। डॉक्टरों का कहना है कि जरा सी भी लापरवाही फेफड़ों के संक्रमण को खतरनाक स्तर तक पहुंचा सकती है। खासकर सुबह और शाम के वक्त जब कोहरे के साथ प्रदूषण हवा में ठहर जाता है, उस दौरान घरों से बाहर निकलने से पूरी तरह बचना चाहिए। घर से बाहर कदम रखते वक्त अच्छी गुणवत्ता वाले मास्क का उपयोग करना अनिवार्य है ताकि जहरीले कण सीधे श्वास नली में प्रवेश न कर सकें।
इसके अलावा, आंखों में जलन और संक्रमण से बचने के लिए समय-समय पर स्वच्छ पानी से आंखें धोने के निर्देश दिए गए हैं। बढ़ते धूल-कणों के प्रकोप को थामने के लिए रिहायशी इलाकों और घरों के आसपास पानी का छिड़काव करने पर जोर दिया जा रहा है। यदि किसी भी व्यक्ति को सांस लेने में हल्की सी भी असुविधा या शुरुआती लक्षण महसूस होते हैं, तो उसे बिना देरी किए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए ताकि समय रहते बीमारी को नियंत्रित किया जा सके।
"वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के कारण सीओपीडी और अस्थमा के मरीजों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। अस्पताल में आने वाले पीड़ितों को फिजियोथेरेपी और आधुनिक मशीनों के माध्यम से राहत दी जा रही है। नागरिकों से अपील है कि वे सुबह की सैर कुछ दिनों के लिए टाल दें और बाहर निकलते समय मास्क का अनिवार्य रूप से प्रयोग करें।" - डॉ. नेहा बंसल, फिजियोथेरेपिस्ट, जिला नागरिक अस्पताल, पानीपत।
प्रशासनिक निष्क्रियता और पर्यावरणीय संकट पर उठ रहे गंभीर सवाल
पानीपत जैसे औद्योगिक और घनी आबादी वाले जिले में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक और पर्यावरणीय प्रबंधन की पोल खोलने वाला बड़ा मुद्दा बन चुका है। शहर में उड़ती धूल, औद्योगिक कचरे के धुएं और समय पर पानी का छिड़काव न होने जैसी व्यवस्थाओं के कारण आम आदमी का सांस लेना दूभर हो गया है। नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि स्थानीय प्रशासन ने जल्द ही प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दिनों में यह स्थिति एक विकराल स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले सकती है।
पानीपत लाइव की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान यह बात सामने आई है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए एंटी-स्मॉग गन और नियमित छिड़काव अभियान को और अधिक तेज करना होगा। केवल अस्पतालों में इलाज मुहैया कराना इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है, बल्कि प्रदूषण के मूल कारणों पर कड़ा प्रहार करना वक्त की सबसे बड़ी मांग है ताकि पानीपत के नौनिहालों और बुजुर्गों के फेफड़ों को बचाया जा सके।




