पानीपत जिले में धान की फसल की कटाई के दौर के साथ ही फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर प्रशासनिक और विभागीय हलचल तेज हो गई है। वायु गुणवत्ता को बनाए रखने और खेतों की प्राकृतिक उर्वरता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कृषि एवं किसान कल्याण विभाग तथा केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की संयुक्त टीमें धरातल पर उतरकर किसानों को जागरूक कर रही हैं। विभाग का सीधा संदेश है कि पराली को अग्नि के हवाले करने के बजाय उसे आधुनिक कृषि यंत्रों के माध्यम से खेत की मिट्टी में मिलाया जाए या बेलर मशीनों के जरिए उसकी गांठें तैयार कराई जाएं।
कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने से न केवल वायुमंडल में जानलेवा धुआं फैलता है, बल्कि जमीन की ऊपरी सतह पर मौजूद मित्र कीट और सूक्ष्म पोषक तत्व पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत, यदि फसल के अवशेषों को रोटावेटर, सुपर सीडर या हैप्पी सीडर जैसी मशीनों की मदद से मिट्टी के भीतर दबा दिया जाए, तो यह जैविक खाद का रूप धारण कर लेती है। इससे अगली फसल के लिए जमीन की जल धारण क्षमता और जैविक गुणवत्ता में व्यापक सुधार होता है।
जिले में कटाई की स्थिति एवं पर्यावरण दल का निरीक्षण अभियान
पानीपत जिले में चालू खरीफ सीजन के दौरान करीब 75 हजार हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि पर धान की बिजाई की गई थी। अब तक लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र में कटाई का कार्य शांतिपूर्ण तरीके से पूरा हो चुका है। खेतों से अवशेष हटाने और उनकी उपयोगिता सुनिश्चित करने के लिए वर्तमान में 50 से अधिक बेलर मशीनें विभिन्न ग्रामीण अंचलों में निरंतर कार्यरत हैं। ये मशीनें पराली को इकट्ठा करके उसकी गड्डियां बनाती हैं, जिन्हें बाद में उद्योगों और ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के रूप में उपयोग में लाया जाता है।
इसी कड़ी में केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली से आई विशेष जांच टीम की अधिकारी डॉ. विजयलक्ष्मी ने स्थानीय कृषि अधिकारियों के साथ जिले के कचरौली, बाबरपुर, बड़ौली और उझा गांवों का दौरा किया। टीम ने सीधे खेतों में पहुंचकर किसानों से बातचीत की और पराली न जलाने के वैज्ञानिक व आर्थिक फायदे समझाए। डॉ. विजयलक्ष्मी ने किसानों को बताया कि पराली प्रबंधन के आधुनिक तरीके अपनाकर किसान न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं, बल्कि अपनी कृषि लागत में भी भारी कटौती कर सकते हैं।
| प्रमुख पहलू | वर्तमान स्थिति / आंकड़े | संभावित लाभ / प्रभाव |
|---|---|---|
| धान का कुल रकबा | लगभग 75,000 हेक्टेयर | जिले भर में व्यापक उत्पादन सम्भावित |
| कटाई का वर्तमान स्तर | 40% क्षेत्र में पूर्ण | शेष क्षेत्रों में तेजी से जारी काम |
| सक्रिय बेलर मशीनें | 50 से अधिक यूनिट्स | पराली की गांठें बनाकर औद्योगिक उपयोग |
| अग्नि दुर्घटना की स्थिति | बराना गांव में 2 एकड़ (हादसा) | शॉर्ट सर्किट के कारण हुआ, किसान निर्दोष |
बराना गांव में घटी दुर्घटना और प्रशासनिक पड़ताल
हाल ही में जिले के बराना गांव में पराली में आग लगने की एक घटना दर्ज की गई थी। शुरुआत में इसे पराली जलाने के मामले से जोड़कर देखा जा रहा था, परंतु विभागीय जांच में सच सामने आ गया। दरअसल, खेत के ऊपर से गुजर रही बिजली की हाई-टेंशन तारों के अचानक टूटकर गिरने के कारण शार्ट सर्किट हुआ और दो एकड़ खेत में पड़े अवशेषों में आग लग गई। कृषि और राजस्व विभाग की संयुक्त जांच में किसान की किसी भी प्रकार की लापरवाही या गलती नहीं पाई गई, जिससे स्पष्ट हुआ कि यह एक अनहोनी दुर्घटना थी।
प्रशासनिक अधिकारियों ने विद्युत निगम को भी निर्देश दिए हैं कि जर्जर तारों की तत्काल मरम्मत कराई जाए ताकि कटाई के इस संवेदनशील सीजन में खेतों के भीतर किसी भी प्रकार के हादसे की आशंका को खत्म किया जा सके। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में गश्त बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी स्थान पर धुआं उठने पर तुरंत दमकल विभाग और पराली प्रबंधन टीमों को सूचित किया जा सके।
"कृषि विभाग जिले के प्रत्येक किसान को फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रहा है। पराली को खेत में मिलाने से जमीन की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है और प्रदूषण पर प्रभावी अंकुश लगता है। हमारी टीमें गांव-गांव जाकर बेलर मशीनों व कृषि यंत्रों की उपलब्धता सुनिश्चित करा रही हैं।"
— सुधीर कुमार, सहायक कृषि अभियंता, पानीपत
स्थानीय जनजीवन, वायु गुणवत्ता और जनस्वास्थ्य पर प्रभाव
अक्तूबर और नवंबर के महीनों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) का हिस्सा होने के कारण पानीपत में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के बिगड़ने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में यदि खेतों में पराली जलाने की घटनाएं रोक ली जाएं, तो शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों, बच्चों और सांस के मरीजों को भारी राहत मिलती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन और किसानों की संयुक्त सतर्कता से ही इस वर्ष स्मॉग और जहरीले धुएं से बचाव संभव हो पाएगा।
व्यापारिक और सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो स्वच्छ पर्यावरण जिले की आर्थिक गतिविधियों के लिए भी सुखद स्थिति निर्मित करता है। खेतों में जैविक कार्बन बढ़ने से रासायनिक उर्वरकों (जैसे यूरिया और डीएपी) पर किसानों की निर्भरता कम होगी, जिससे आने वाले समय में खेती की लागत घटेगी और पैदावार की गुणवत्ता में सुधार होगा।
प्रशासन की भावी रणनीति और कड़े निगरानी तंत्र
पानीपत जिला प्रशासन ने उपमंडल स्तर पर नोडल अधिकारियों की तैनाती की है जो सैटेलाइट लोकेशन और ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए खेतों पर पैनी नजर रख रहे हैं। ब्लॉक स्तर पर स्थापित की गई टीमें रोजाना गांवों में जाकर किसानों को बेलर मशीनों के संपर्क सूत्र उपलब्ध करा रही हैं। इसके साथ ही, कस्टम हायरिंग सेंटरों के माध्यम से छोटे व सीमांत किसानों को रियायती दरों पर कृषि यंत्र मुहैया कराए जा रहे हैं ताकि कोई भी किसान संसाधनों के अभाव में पराली को आग लगाने के लिए मजबूर न हो।




