हरियाणा ने अपने खेल इतिहास का एक अनमोल सितारा खो दिया है। जींद जिले के जुलाना उपमंडल अंतर्गत शादीपुर गांव के निवासी एवं पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी मास्टर धर्मपाल लाठर का 85 वर्ष की आयु में अस्वस्थता के चलते निधन हो गया। उनके देहावसान की खबर मिलते ही न केवल जींद और जुलाना क्षेत्र बल्कि पूरे प्रदेश के खेल प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। धर्मपाल लाठर उस दौर के अग्रणी खिलाड़ियों में शामिल थे, जब संसाधन सीमित थे, लेकिन खेल के प्रति निष्ठा और समर्पण अद्वितीय हुआ करता था।
अपने स्वर्णिम खेल करियर के दौरान उन्होंने न केवल राष्ट्रीय पटल पर हरियाणा का नाम रोशन किया, बल्कि अपनी उत्कृष्ट कप्तानी में राज्य की हॉकी टीम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। वर्ष 1971 में उनके कुशल नेतृत्व में हरियाणा की हॉकी टीम ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। खेल के मैदान से सेवानिवृत्त होने के उपरांत भी वे निरंतर युवा प्रतिभाओं को मार्गदर्शन देते रहे और ग्रामीण अंचल में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभाई।
ध्यानचंद के शिष्य और 1971 के स्वर्णिम दौर का गौरवशाली सफर
मास्टर धर्मपाल लाठर का हॉकी से जुड़ाव उस दौर में शुरू हुआ था, जब आधुनिक एस्ट्रोटर्फ और हाई-टेक ट्रेनिंग की सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। मिट्टी और घास के मैदानों पर अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके खेल करियर का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब उन्हें पंजाब के पटियाला में भारतीय हॉकी के 'जादूगर' मेजर ध्यानचंद से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण और खेल की बारीकियां सीखने का अवसर मिला। ध्यानचंद से मिली उस सीख ने उनके खेल में अद्भुत निखार लाया।
इसके बाद उन्होंने हरियाणा की प्रांतीय टीम में अपनी जगह पक्की की। पारिवारिक सूत्रों और उनके पौत्र नीरज लाठर के अनुसार, धर्मपाल लाठर वर्ष 1969 से लेकर 1974 तक निरंतर हरियाणा की राष्ट्रीय हॉकी टीम का अभिन्न अंग रहे। इस पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान उन्हें दो वर्षों तक टीम की कप्तानी करने का गौरव भी प्राप्त हुआ। वर्ष 1971 की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में जब हरियाणा ने स्वर्ण पदक जीता, तब लाठर ही टीम के नायक और कप्तान थे।
| प्रमुख विवरण | तथ्य व जानकारी |
|---|---|
| नाम | मास्टर धर्मपाल लाठर |
| आयु व निवास | 85 वर्ष, गांव शादीपुर (जुलाना, जींद) |
| खेल पहचान | पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी व हरियाणा टीम के पूर्व कप्तान |
| सक्रिय खेल वर्ष | 1969 से 1974 (दो वर्ष कप्तानी) |
| प्रमुख उपलब्धि | 1971 में कप्तान के रूप में हरियाणा को स्वर्ण पदक दिलाया |
| प्रशिक्षक/मार्गदर्शक | हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद (पटियाला) |
| व्यावसायिक सेवा | राजकीय विद्यालय में शारीरिक प्रशिक्षण अनुदेशक (PTI) |
| परिवार | पत्नी (अंगूरी देवी), 2 बेटे, पुत्रवधुएं, पोते व परपोते |
खेल जगत में शोक की लहर और श्रद्धांजलि का दौर
धर्मपाल लाठर के निधन की सूचना मिलते ही खेल जगत, सामाजिक संगठनों और स्थानीय गणमान्य लोगों में गहरा शोक छा गया। उनके पैतृक गांव शादीपुर में अंतिम दर्शनों के लिए लोगों का तांता लग गया। विभिन्न खेल संघों के प्रतिनिधियों और पूर्व खिलाड़ियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि लाठर साहब का जाना हरियाणा हॉकी के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है। उन्होंने विषम परिस्थितियों में प्रदेश में हॉकी की मजबूत नींव रखी थी।
स्थानीय खेल विशेषज्ञों का कहना है कि 1970 के दशक में जब हरियाणा में ढांचागत खेल सुविधाओं का अभाव था, तब धर्मपाल लाठर जैसे जुझारू खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत से प्रदेश को खेल मानचित्र पर स्थापित किया। उनके द्वारा जीता गया 1971 का स्वर्ण पदक आज भी हरियाणा हॉकी के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।
blockquote>"दादाजी का पूरा जीवन अनुशासन, खेल और राष्ट्र सेवा को समर्पित रहा। मेजर ध्यानचंद जी से मिली सीख को उन्होंने जीवन भर संजोकर रखा और हमेशा यही सिखाया कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का रास्ता है।"- नीरज लाठर (पौत्र)
शिक्षा और खेल के समन्वय से युवाओं का निर्माण
राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाने के बाद मास्टर धर्मपाल लाठर ने शिक्षा क्षेत्र के माध्यम से समाज सेवा का मार्ग चुना। उनके अपार खेल अनुभव और योग्यता को देखते हुए उन्हें राजकीय विद्यालय में शारीरिक प्रशिक्षण अनुदेशक (PTI) के पद पर नियुक्त किया गया। अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ग्रामीण बच्चों को हॉकी और अन्य खेलों के प्रति प्रेरित किया।
एक शिक्षक के रूप में उन्होंने न केवल विद्यार्थियों को शारीरिक रूप से सशक्त बनाया, बल्कि उनमें अनुशासन और खेल भावना का बीजारोपण भी किया। उनके द्वारा तराशे गए कई खिलाड़ी आगे चलकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने में सफल रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे गांव और आसपास के युवाओं को नशे से दूर रहकर खेल के मैदान से जुड़ने की सीख देते रहे।
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणापुंज रहेगा लाठर का जीवन
मास्टर धर्मपाल लाठर अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में 70 वर्षीया धर्मपत्नी अंगूरी देवी, दो बेटे यशपाल व रजनीश, पुत्रवधुएं सुदेश व निर्मला, पोते नीरज व विवेक, पौत्रवधुएं अंजू व अन्नु तथा परपोता यशित शामिल हैं। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा है, लेकिन साथ ही उन्हें अपने मुखिया के महान गौरवशाली इतिहास पर गर्व भी है।
उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव शादीपुर में पूर्ण सम्मान के साथ संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों, खिलाड़ियों और गणमान्य व्यक्तियों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। खेल विश्लेषकों का मानना है कि आज हरियाणा अगर देश का 'स्पोर्ट्स हब' बना हुआ है, तो इसकी नींव मास्टर धर्मपाल लाठर जैसे निष्ठावान खिलाड़ियों के त्याग और मेहनत पर ही टिकी है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।




