हरियाणा में सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) एक बार फिर गंभीर चर्चा के केंद्र में आ गई है। कर्मचारी संगठनों और प्रशासनिक सुधारों की मांग करने वाले मंचों ने इस व्यवस्था की पारदर्शिता और सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। ताजा मामला तब सामने आया जब पेंशन बहाली संघर्ष समिति के प्रांतीय नेतृत्व ने अपने ही एनपीएस खाते के आंकड़ों को सार्वजनिक करते हुए दावा किया कि लगातार अंशदान कटने के बावजूद जमा पूंजी में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है। इस प्रकार की विसंगतियों ने उन लाखों कर्मचारियों की चिंता बढ़ा दी है, जो अपने बुढ़ापे के सहारे के रूप में इस योजना पर निर्भर हैं।
मामले की गहराई तक जाएं तो यह पूरा घटनाक्रम राज्य के प्रशासनिक गलियारों में कर्मचारियों के बीच असंतोष का नया कारण बनता दिख रहा है। नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम के राष्ट्रीय मुख्य संगठन सचिव और संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष विजेंद्र सिंह धारीवाल ने तथ्यात्मक ब्योरा साझा करते हुए बताया कि उनके टियर-वन खाते में वित्तीय और निवेश संबंधी उतार-चढ़ाव के कारण अंशदान जुड़ने के बावजूद संतुलन बिगड़ रहा है। उनके अनुसार, बाजार की मौजूदा चाल और फंड प्रबंधन के तरीकों से यह साफ नहीं हो पा रहा है कि कर्मचारी द्वारा वर्षों तक गाढ़ी कमाई से दिया जाने वाला अंशदान पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। इस तरह की घटनाएं कर्मचारियों के भीतर अनिश्चितता का माहौल पैदा कर रही हैं।
खाते के आंकड़ों का सिलसिलेवार ब्योरा और विसंगति के दावे
पेंशन बहाली संघर्ष समिति के पदाधिकारियों द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष 30 जून तक संबंधित टियर-वन खाते में सत्रह लाख से अधिक की राशि मौजूद थी। इसके बाद जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीनों में लगातार वेतन से कटकर लगभग तिरपन हजार रुपये का अतिरिक्त अंशदान उस खाते में ट्रांसफर किया गया। इस हिसाब से सितंबर के अंत तक कुल राशि में नियमानुसार बढ़ोतरी होनी चाहिए थी, परंतु महीने के अंतिम दिन जब विवरण देखा गया तो आंकड़े उम्मीद से काफी कम दर्ज मिले। इसके बाद अक्टूबर माह में भी नया अंशदान जुड़ने के बावजूद खाते की कुल वैल्यू में गिरावट दर्ज किए जाने का दावा किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि एनपीएस जैसी अंशदायी योजनाओं में राशि का घटना या बढ़ना शेयर बाजार, बॉन्ड मार्केट और सरकारी प्रतिभूतियों में होने वाले निवेश के दैनिक मूल्यांकन पर निर्भर करता है। हालांकि, कर्मचारियों का तर्क है कि जब हर महीने निश्चित रूप से उनका पैसा जमा हो रहा है, तो इस प्रकार के उतार-चढ़ाव से मूलधन तक प्रभावित होना वित्तीय अनुशासन के दावों पर सवाल खड़े करता है। इस पूरी स्थिति ने राज्य के विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को अपने भविष्य की सुरक्षा को लेकर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।
| अवधि / तिथि | खाते की स्थिति व अंशदान | दर्ज कुल राशि |
|---|---|---|
| 30 जून 2026 | प्रारंभिक जमा राशि | 17,59,473.57 रुपये |
| जुलाई - सितंबर 2026 | कुल नया अंशदान जुड़ा | 53,223.00 रुपये |
| 30 सितंबर 2026 | खाते में दर्ज कुल राशि | 17,83,202.47 रुपये |
| 27 अक्टूबर 2026 | अंशदान के बाद अद्यतन राशि | 17,82,686.43 रुपये |
कर्मचारी संगठनों का कड़ा रुख और ओपीएस बहाली की मांग
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पेंशन बहाली संघर्ष समिति ने सरकार के समक्ष स्पष्ट नीतिगत जवाब की मांग रखी है। नेताओं का कहना है कि देश और समाज सेवा में अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष समर्पित करने वाले कर्मचारियों को उनके बुढ़ापे में बाजार के जोखिमों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। संगठन का यह भी आरोप है कि सरकारें कर्मचारियों की चिंताओं को दूर करने के लिए केवल सतही आश्वासन दे रही हैं, जबकि धरातल पर कोई ठोस सुरक्षा चक्र तैयार नहीं किया गया है। पूर्व में गठित उच्चाधिकार प्राप्त समितियों और मुख्य स्तर की बैठकों के बावजूद कोई ऐसा परिणाम सामने नहीं आया जिससे कर्मचारियों का विश्वास इस नई प्रणाली पर बन सके।
कर्मचारियों का यह भी कहना है कि यूनिफाइड पेंशन स्कीम जैसी अन्य योजनाओं के प्रावधान भी उनकी पूर्ण संतुष्टि के अनुकूल नहीं हैं। उनकी एकमात्र और मुख्य मांग पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को दोबारा लागू करने की है, जिसमें निश्चित पेंशन की गारंटी मिलती थी। इसी मांग को लेकर राज्य के विभिन्न जिलों में लगातार संकल्प मार्च निकाले जा रहे हैं और जिला प्रशासन के माध्यम से देश व प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व को ज्ञापन प्रेषित किए जा रहे हैं।
"जब कर्मचारी अपना पूरा जीवन निष्ठा से सेवा में लगा देता है, तो सेवानिवृत्ति के बाद उसे आर्थिक असुरक्षा के साये में नहीं जीना चाहिए। बाजार आधारित पेंशन प्रणाली हमारे बुढ़ापे की गारंटी नहीं हो सकती। जब तक पुरानी पेंशन बहाल नहीं होती, हमारा संघर्ष इसी तरह जारी रहेगा।" - विजेंद्र सिंह धारीवाल, प्रदेश अध्यक्ष, पेंशन बहाली संघर्ष समिति
आंदोलन को और व्यापक बनाने की तैयारी और आगामी रणनीति
राज्यभर में बढ़ते इस असंतोष को देखते हुए संघर्ष समिति ने अपने आंदोलन को और अधिक तीव्र करने का निर्णय लिया है। आने वाले दिनों में तहसील और जिला स्तर पर बड़े सम्मेलनों और विरोध प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार की जा रही है। संघ के पदाधिकारियों ने हरियाणा के सभी विभागों, बोर्डों और निगमों के कर्मचारियों से आह्वान किया है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने भविष्य की रक्षा के लिए इस वैचारिक और मैदानी लड़ाई में एकजुट हों। उनका मानना है कि यदि समय रहते सरकार ने इस दिशा में सकारात्मक और नीतिगत कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन आने वाले समय में एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर भी इस बहस के दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। एक तरफ जहां सरकार वित्तीय सुधारों और आधुनिक पेंशन फंड प्रबंधन को बेहतर मानती है, वहीं दूसरी तरफ कर्मचारी वर्ग निश्चितता और सुरक्षा की मांग पर अडिग है। एनपीएस खातों के उतार-चढ़ाव से उपजा यह ताजा विवाद आने वाले दिनों में हरियाणा के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरने की पूरी संभावना रखता है।




