पानीपत जिले की मंडियों में अन्नदाता एक बार फिर प्रशासनिक और सरकारी एजेंसियों की ढुलमुल कार्यशैली का शिकार होता नजर आ रहा है। धान की फसल बेचने के बाद भी किसानों के खातों में पूरी राशि न पहुंच पाने के कारण इस बार उनके घरों में दिवाली फीकी रहने की पूरी आशंका है। एक तरफ जहां किसान अपनी मेहनत का हक पाने के लिए मंडियों के चक्कर काट रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकारी एजेंसियों का सुस्त रवैया उनकी परेशानियों को और ज्यादा बढ़ा रहा है। फसल कटाई और बिक्री का मुख्य सीजन होने के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी की यह लापरवाही कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
स्थानीय मंडियों में इन दिनों धान की विभिन्न किस्मों की बंपर आवक देखने को मिल रही है। खासकर 1121 और 1509 जैसी प्रीमियम किस्मों के साथ-साथ पीआर धान की खरीद का कार्य भी लगातार चल रहा है। लेकिन खरीद के आंकड़े और धरातल पर उठान की वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई दे रहा है। किसान अपने परिवारों के लिए इस पावन पर्व पर नए कपड़े और मिठाइयां खरीदने के लिए मजबूरन आढ़तियों से कर्ज या उधार लेने को विवश हो चुके हैं। मंडियों में अपनी फसल के ढेर के पास बैठे किसानों के चेहरों पर साफ निराशा देखी जा सकती है।
सरकारी खरीद और उठान के आंकड़े पेश करते हैं बदहाली की तस्वीर
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जिले की विभिन्न मंडियों में सरकारी एजेंसियों द्वारा पीआर धान की खरीद बड़े पैमाने पर की गई है। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग (हेफेड) और हरियाणा राज्य वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन (HWC) जैसी प्रमुख सरकारी एजेंसियों को इस बार पीआर धान खरीद की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मंडियों में अब तक कुल मिलाकर लगभग 21,084 मीट्रिक टन की आवक दर्ज की गई है, जिसकी कुल अनुमानित राशि करीब 28.14 करोड़ रुपये बैठती है। इसमें से सरकारी एजेंसियों ने लगभग 16,621.2 मीट्रिक टन धान की विधिवत खरीद तो कर ली है, लेकिन इसके सापेक्ष उठान का ग्राफ बेहद निराशाजनक रहा है।
मौजूदा स्थिति यह है कि तमाम दावों के बावजूद अभी तक केवल 11,931 मीट्रिक टन धान का ही मंडियों से गोदामों या मिलों के लिए उठान संभव हो पाया है। इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग 4,690.2 मीट्रिक टन धान आज भी खुले आसमान के नीचे या मंडियों के शेड में सड़ने और खराब होने के अंदेशे के बीच पड़ा हुआ है। नियम के अनुसार, जब तक मंडियों से धान का शत-प्रतिशत उठान नहीं हो जाता, तब तक पूरी भुगतान प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनें बनी रहती हैं, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
| धान की किस्म / विवरण | कुल खरीद मात्रा (मीट्रिक टन) | कुल खरीद राशि (करोड़ रुपये) | कुल भुगतान राशि (करोड़ रुपये) | बकाया भुगतान (करोड़ रुपये) |
|---|---|---|---|---|
| पीआर धान (सरकारी एजेंसियां) | 16,621.2 | 28.14 | 25.23 | 2.91 |
| 1121 और 1509 किस्में | उपलब्ध आंकड़े अनुसार | 29.13 | 26.21 | 2.92 |
| कुल योग स्थिति | संतुलित आंकड़े | 57.27 | 51.44 | 5.83 |
किसानों का दर्द: फसल बिकने के बाद भी हाथों में खालीपन और कर्ज का बोझ
पलड़ी गांव के प्रगतिशील किसान रमेश कुमार ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी फसल बेचे हुए लंबा समय बीत चुका है, लेकिन पानीपत लाइव उनके बैंक खाते में पूरी राशि नहीं पहुंच पाई है। उन्होंने कहा कि त्योहारी सीजन सिर पर है, बच्चों के लिए कपड़े और घर के अन्य बुनियादी खर्चों को पूरा करने के लिए उनके पास एक भी फूटी कौड़ी नहीं बची है। बार-बार संबंधित अधिकारियों और खरीद केंद्रों के चक्कर काटने के बावजूद उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। रमेश कुमार जैसे दर्जनों अन्य किसानों का यही कहना है कि यदि समय पर भुगतान मिल जाता, तो उन्हें इस प्रकार की जिल्लत का सामना नहीं करना पड़ता।
एक अन्य किसान सुरेश पाल ने सरकार और खरीद एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि कागजों और विज्ञापनों में किसानों की आय दोगुनी करने और तमाम सुविधाएं देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल की सच्चाई इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। मंडियों में उठान की इस कछुआ चाल ने किसानों की आर्थिक कमर तोड़ कर रख दी है। आढ़ती भी अपनी तरफ से सीमित सहयोग ही कर पा रहे हैं, क्योंकि उनके हाथ भी प्रशासनिक नियमों और भुगतान अटकने की वजह से बंधे हुए हैं। किसानों का यह आक्रोश इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामी मौजूद है।
"मंडियों में धान की आवक और खरीद प्रक्रिया निरंतर जारी है। सभी संबंधित खरीद एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे प्राथमिकता के आधार पर मंडियों से धान का तीव्र गति से उठान सुनिश्चित करें। जिन किसानों का भुगतान किन्हीं कारणों से अटका हुआ है, उन्हें जल्द से जल्द उनकी फसल की पूरी राशि का भुगतान कर दिया जाएगा। लापरवाही बरतने वाली एजेंसियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।" — डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ, उपायुक्त, पानीपत।
प्रशासनिक और विभागीय जवाबदेही पर उठते सवाल और आगामी कदम
जिला प्रशासन की ओर से भले ही हर बार की तरह इस बार भी त्वरित कार्रवाई और जल्द उठान के रटे-رटाए आश्वासन दिए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बहुत धीमा दिखाई दे रहा है। त्योहारी सीजन के बीच किसानों की जेब खाली होना स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा झटका है। जब तक मंडियों से ट्रांसपोर्टेशन और लिफ्टिंग की प्रक्रिया में तेजी नहीं लाई जाती, तब तक न तो गोदामों में जगह बनेगी और न ही किसानों के खातों में समय पर पैसे आ सकेंगे। पानीपत लाइव ब्यूरो की टीम इस पूरे मामले पर पैनी नजर बनाए रखेगी और प्रशासन की जवाबदेही तय करने के लिए लगातार खबरें प्रकाशित करती रहेगी ताकि अन्नदाता को उसका हक समय पर मिल सके।




