राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के साथ-साथ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में एक बार फिर वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ने लगा है। नवंबर के शुरुआती दिनों में ही हवा की गुणवत्ता इस हद तक गिर चुकी है कि आम जनजीवन प्रभावित होने की पूरी आशंका बन गई है। पिछले सप्ताह हुई बारिश की वजह से वातावरण में जो अस्थायी सुधार देखा गया था, वह अब पूरी तरह बेअसर साबित हो रहा है। प्रशासन और पर्यावरणविदों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, सोमवार सुबह के समय दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 307 के आंकड़े को पार कर गया। इस सीजन में यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय राजधानी की हवा सीधे 'बेहद खराब' श्रेणी में दर्ज की गई है। स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहर के अधिकांश निगरानी केंद्रों पर हवा में घुल चुके प्रदूषणकारी कणों की मात्रा तय मानकों से कई गुना अधिक पाई गई है।
हरियाणा के कई जिलों में बिगड़ी आबोहवा
प्रदूषण का यह प्रकोप केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पड़ोसी राज्य हरियाणा के विभिन्न शहरी व औद्योगिक क्षेत्रों पर भी साफ दिखने लगा है। सोमवार को जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, गुरुग्राम में वायु गुणवत्ता सूचकांक 230 दर्ज किया गया, जबकि पास के मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में यह 214 रहा। ये दोनों क्षेत्र 'खराब' श्रेणी के दायरे में आते हैं। इसके अलावा, हरियाणा के कैथल जिले में हालात सबसे अधिक डराने वाले रहे, जहां AQI उछलकर 324 तक पहुंच गया जो कि 'बेहद खराब' श्रेणी का द्योतक है।
हालांकि राज्य के कुछ हिस्सों में स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रण में भी नजर आई, जैसे फरीदाबाद में AQI 118 दर्ज किया गया जो मध्यम श्रेणी में आता है। लेकिन इसके बावजूद अधिकांश मैदानी इलाकों में हवा की सेहत लगातार गिर रही है। औद्योगिक गतिविधियों, वाहनों के धुएं और मौसमी बदलावों के चलते वातावरण में प्रदूषक तत्व तेजी से जमा हो रहे हैं, जिससे आसपास के जिलों में भी सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है।
| शहर / क्षेत्र | दर्ज किया गया AQI | वायु गुणवत्ता श्रेणी |
|---|---|---|
| दिल्ली (औसत) | 307 | बेहद खराब |
| कैथल (हरियाणा) | 324 | बेहद खराब |
| गुरुग्राम (हरियाणा) | 230 | खराब |
| मानेसर (हरियाणा) | 214 | खराब |
| फरीदाबाद (हरियाणा) | 118 | मध्यम |
विशेषज्ञों की चेतावनी और पराली जलाने के आंकड़े
मौसम विशेषज्ञों और पर्यावरण विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। मौसम विज्ञानी नवदीप दहिया के अनुसार, हवा की कम गति और उसकी दिशा में बदलाव के कारण प्रदूषक कण लंबे समय तक वातावरण के निचले स्तर पर ही टिके रहेंगे। अगले एक सप्ताह से दस दिनों तक मौसम की परिस्थितियां प्रदूषण को कम करने में सहायक साबित नहीं होंगी, जिससे पूरे उत्तर भारत में स्मॉग की चादर और गहरी हो सकती है।
इसके अलावा, खेतों में पराली जलाने के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर की शुरुआत से नवंबर के पहले दिन तक पंजाब और हरियाणा के विभिन्न खेतों में आग लगने की सैकड़ों घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। हालांकि प्रशासन और कृषि विभाग इन घटनाओं पर रोक लगाने के लिए लगातार निगरानी रख रहे हैं, फिर भी पराली के धुएं और स्थानीय कारणों का मिला-जुला असर हवा की गुणवत्ता को और बिगाड़ रहा है।
"हवा की गति थमने और वायुमंडलीय परिस्थितियों के अनुकूल न होने के कारण आगामी दिनों में स्मॉग का प्रकोप बढ़ने की पूरी आशंका है। नागरिकों को इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।"
स्वास्थ्य पर असर और एहतियाती कदम
हवा की गुणवत्ता बेहद खराब होने की वजह से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। चिकित्सकों की सलाह है कि सुबह और शाम के वक्त अत्यधिक बाहर निकलने से बचा जाए और मॉर्निंग वॉक के दौरान विशेष सावधानी बरती जाए। यदि प्रदूषण का स्तर इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले दिनों में स्थानीय स्तर पर ग्रेप (GRAP) नियमों के तहत पाबंदियों को और सख्त किया जा सकता है, ताकि बिगड़ते हालातों पर काबू पाया जा सके।




