हरियाणा में ऊर्जा क्षेत्र के पुनर्गठन और बिजली वितरण व्यवस्था के निजीकरण के मुद्दे ने प्रदेश की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री प्रो. संपत सिंह ने दावा किया है कि बिजली निगमों के कर्मचारियों और इंजीनियरों के संगठित आंदोलन के अभूतपूर्व दबाव में आकर राज्य सरकार को निजीकरण की अपनी मंशा से पीछे हटने के लिए बाध्य होना पड़ा है। हिसार स्थित अपने आवास पर आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार को समीक्षा याचिकाओं का सहारा लेने के बजाय बिजली वितरण के निजीकरण से जुड़े सभी प्रस्तावों को स्थायी रूप से रद्द कर देना चाहिए।
इनेलो नेता ने न केवल सत्तारूढ़ व्यवस्था पर निशाना साधा, बल्कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के रुख पर भी कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि गुरुग्राम और नूंह जैसे अति-महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं वाणिज्यिक क्षेत्रों में समानांतर बिजली वितरण का लाइसेंस निजी संस्थाओं को देने की प्रशासनिक प्रक्रिया चलाई जा रही थी, लेकिन उस दौरान विपक्ष की चुप्पी बेहद संदिग्ध रही। जनहित से जुड़े इस संवेदनशील विषय पर केवल इनेलो ने कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर आपत्तियां दर्ज कराईं।
निजीकरण प्रस्ताव और बिजली आंदोलन का सिलसिलेवार घटनाक्रम
हरियाणा के बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों की प्रविष्टि को लेकर उठ रहे विवाद की जड़ें राज्य विनियामक आयोग के समक्ष प्रस्तुत आवेदनों से जुड़ी हैं। प्रो. संपत सिंह के अनुसार, जब एक निजी संस्थान की ओर से गुरुग्राम और नूंह क्षेत्र में समानांतर वितरण नेटवर्क बिछाने का आवेदन प्रस्तुत किया गया, तो महज सात दिनों के भीतर प्रशासनिक शर्तों को पूरा मानकर लाइसेंस जारी करने का मसौदा तैयार कर लिया गया था। इस त्वरित प्रक्रिया ने बिजली महकमे के अधिकारियों, यूनियनों और कर्मचारी संगठनों के भीतर भारी असंतोष पैदा कर दिया, जिसके बाद राज्यव्यापी आंदोलन का बिगुल बजाया गया।
कर्मचारियों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों और हड़ताल की चेतावनियों के चलते स्थिति तनावपूर्ण हो गई। इनेलो नेता का दावा है कि यदि कर्मचारी वर्ग मजबूती से सड़कों पर न उतरता और कानूनी चुनौतियां पेश न की जातीं, तो राज्य सरकार इस फैसले को चुपचाप लागू कर देती। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सरकार सचमुच निजीकरण के खिलाफ थी, तो फिर विनियामक आयोग में निजी आवेदकों की अर्जियों पर कई चरणों की विस्तृत सुनवाई करने की अनुमति ही क्यों दी गई, इसका जवाब प्रदेश की जनता को मिलना चाहिए।
| मुख्य पहलू | वर्तमान स्थिति / आंकड़े | इनेलो की मांग / दावा |
|---|---|---|
| बिजली निगमों में कुल स्वीकृत पद | लगभग 50,000 पद | निजीकरण पूरी तरह बंद हो |
| वर्तमान में खाली पड़े पद | करीब 25,000 पद (50%) | तत्काल पक्की भर्ती प्रक्रिया शुरू हो |
| गुरुग्राम-नूंह क्षेत्र का राजस्व योगदान | लगभग ₹9,500 करोड़ (DHBVN का 43%) | सरकारी निगमों की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित हो |
| विपक्ष (कांग्रेस) की भूमिका | 28 विधायकों की प्रक्रिया के दौरान चुप्पी | सदन और सड़क पर समय रहते विरोध न दर्ज कराना |
विपक्ष की चुप्पी और विनियामक आयोग की प्रक्रिया पर तीखे सवाल
पत्रकार वार्ता के दौरान प्रो. संपत सिंह ने राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की भूमिका पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि जब निजीकरण का ढांचा तैयार किया जा रहा था और आयोग के समक्ष आपत्तियां दर्ज कराने का समय था, उस समय कांग्रेस के सभी 28 विधायक और शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह मौन साधे रहे। बाद में प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद केवल राजनीतिक बयानबाजी करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। जनता भली-भांति जानती है कि धरातल पर कानूनी लड़ाई किसने लड़ी है।
उन्होंने बिजली अधिनियम 2003 की धारा 108 का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार के पास जनहित में नियामक आयोग को स्पष्ट नीतिगत निर्देश जारी करने का पूर्ण कानूनी अधिकार है। यदि सरकार की नीयत साफ है, तो उसे इस धारा का प्रयोग करते हुए आयोग को निजीकरण के आवेदनों को तुरंत खारिज करने के लिखित आदेश देने चाहिए। समीक्षा याचिका के नाम पर इस विषय को लंबे समय तक लटकाए रखना कर्मचारियों और उपभोक्ताओं दोनों के हित में नहीं है।
blockquote>"दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के कुल राजस्व का लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा गुरुग्राम और नूंह से आता है। यदि 9,500 करोड़ रुपये की आय देने वाले इस स्वर्णिम क्षेत्र को निजी हाथों में सौंप दिया जाता, तो सरकारी बिजली निगम आर्थिक रूप से बदहाल होकर कंगाली की कगार पर पहुंच जाते। सरकार को निजीकरण का मोह छोड़कर खाली पड़े 25 हजार पदों पर पारदर्शी भर्तियां करनी चाहिए।" - प्रो. संपत सिंह, वरिष्ठ नेता, इनेलोबिजली निगमों की आर्थिक स्थिति और 25 हजार खाली पदों की चुनौती
इनेलो के वरिष्ठ नेता ने दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (DHBVN) के आर्थिक ढांचे का विश्लेषणात्मक ब्योरा प्रस्तुत करते हुए बताया कि गुरुग्राम और नूंह क्षेत्र निगम की वित्तीय रीढ़ की हड्डी हैं। इन दोनों जिलों से निगम को सालाना लगभग 9,500 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, जो निगम की कुल आय का 43 फीसदी है। यदि इतने बड़े राजस्व क्षेत्र को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जाता, तो सरकारी निगमों के पास ग्रामीण और कम आय वाले क्षेत्रों में निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने का साधन नहीं बचता।
इसके साथ ही उन्होंने प्रदेश के बिजली निगमों में जनशक्ति (मैनपावर) के भीषण संकट को उजागर किया। आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा के बिजली तंत्र में कुल 50,000 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से लगभग 25,000 पद वर्षों से खाली पड़े हैं। आधे कर्मचारियों के भरोसे पूरे प्रदेश की 24 घंटे बिजली आपूर्ति का भार टिका हुआ है, जिससे मौजूदा कर्मचारियों पर अत्यधिक मानसिक व शारीरिक दबाव बन रहा है और दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ रही है।
भावी राजनीतिक व प्रशासनिक परिदृश्य और आगामी कदम
हरियाणा में बिजली वितरण के निजीकरण को लेकर जारी यह खींचतान अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि आगामी राजनीतिक बहसों का मुख्य केंद्र बिंदु बन गया है। एक तरफ जहां कर्मचारी संगठन अपनी मांगों को लेकर लामबंद हैं, वहीं विपक्षी दल भी इस मुद्दे के जरिए जनसमर्थन जुटाने की होड़ में लग गए हैं। यदि राज्य सरकार बिजली निगमों में खाली पड़े 25 हजार पदों पर पक्की भर्ती के दिशा में कदम नहीं उठाती और निजीकरण के प्रस्तावों को स्थायी रूप से निरस्त करने का औपचारिक पत्र जारी नहीं करती, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है।




