हरियाणा में सार्वजनिक परिवहन को अत्याधुनिक और सुगम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही ओल्ड गुरुग्राम मेट्रो विस्तार परियोजना के सामने एक बार फिर से गंभीर प्रशासनिक और ढांचागत रुकावटें खड़ी हो गईं हैं। पूर्व में बिजली लाइनों की शिफ्टिंग को लेकर आई अड़चनों को जैसे-जैसे संबंधित विभाग सुलझाने के प्रयास में जुटे थे, ठीक उसी समय वन विभाग की ओर से एक नई शर्त सामने आ गई है। इस ताज़ा घटनाक्रम के कारण परियोजना के समयबद्ध क्रियान्वयन पर एक बार फिर से सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं, और स्थानीय स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव देखे जा रहे हैं।
यह पूरा मामला ओल्ड गुरुग्राम क्षेत्र के सेक्टर-10 में प्रस्तावित अत्याधुनिक मेट्रो स्टेशन के निर्माण से जुड़ा हुआ है। गुरुग्राम मेट्रो रेल लिमिटेड (जीएमआरएल) पुराने शहरी क्षेत्रों तक मेट्रो सेवाओं का विस्तार करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है, जिसके तहत इस महत्वपूर्ण रूट की रूपरेखा तैयार की गई है। योजना के अनुसार, सेक्टर-10 में यात्रियों की सुविधा के लिए एक विशाल मेट्रो स्टेशन बनाया जाना है, जिसके लिए भूमि की आवश्यकता थी। हालांकि, जब इस संदर्भ में प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, तो वन विभाग ने अपनी नीतिगत शर्तों के तहत भूमि हस्तांतरण के एवज में दोगुनी जमीन उपलब्ध कराने की मांग रख दी है।
प्रस्तावित सर्विस रोड और वन क्षेत्र की ज़मीन का तकनीकी समीकरण
मेट्रो परियोजना के सुचारू संचालन और भविष्य में यातायात के भारी दबाव को नियंत्रित करने के लिए केवल मेट्रो मार्ग ही नहीं, बल्कि इसके साथ एक चौड़े सर्विस रोड का निर्माण भी अनिवार्य किया गया है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के निर्देश पर राइट्स लिमिटेड (RITES Ltd.) को इस पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वे करने का जिम्मा सौंपा गया था।
एजेंसी द्वारा किए गए धरातलीय सर्वे में यह तथ्यात्मक बात सामने आई कि इस मार्ग के रास्ते में लगभग एक हेक्टेयर वन क्षेत्र की जमीन आ रही है, जिसे परियोजना के दायरे में शामिल किया जाना आवश्यक है। इसके बाद से ही इस भूमि के अधिग्रहण और वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करने को लेकर बैठकों का दौर जारी है। हालांकि जीएमआरएल के उच्च अधिकारियों का यह दावा रहा है कि ओल्ड गुरुग्राम मेट्रो के निर्माण कार्य में मूल रूप से कोई बड़ी तकनीकी बाधा नहीं है, लेकिन इस प्रकार की विभागीय शर्तें समय को जरूर खींच रही हैं।
| परियोजना विवरण | मुख्य तथ्य व आंकड़े |
|---|---|
| कुल मेट्रो मार्ग लंबाई | लगभग 15 किलोमीटर |
| प्रस्तावित कुल स्टेशन | 14 मेट्रो स्टेशन |
| बाधा का मुख्य क्षेत्र | सेक्टर-10 मेट्रो स्टेशन और सर्विस रोड |
| प्रभावित वन भूमि | लगभग 1 हेक्टेयर |
अधिकारियों की मॉनिटरिंग और तय डेडलाइन पर मंडराता संकट
परियोजना में लगातार आ रही इन तमाम बाधाओं और प्रशासनिक अड़चनों का संज्ञान लेते हुए जीएमआरएल के चेयरमैन पीसी मीणा ने विशेष रूप से अधिकारियों की ड्यूटियां तय की थीं। उनका स्पष्ट निर्देश था कि सभी संबंधित महकमे आपसी तालमेल बिठाकर इन रोड़ों को जल्द से जल्द दूर करें, ताकि निर्माण कार्य तय समयसीमा के भीतर मुकम्मल किया जा सके। इस संपूर्ण मेट्रो नेटवर्क को पूरा करने के लिए शुरुआत में 24 महीने यानी दो साल की सख्त डेडलाइन निर्धारित की गई थी।
हैरानी की बात यह है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना की निर्धारित समयसीमा के 14 महीने पहले ही व्यतीत हो चुके हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर काम उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाया जिसकी उम्मीद की जा रही थी। कुल 15 किलोमीटर लंबे इस मेट्रो मार्ग पर लगभग 14 अत्याधुनिक मेट्रो स्टेशन विकसित किए जाने हैं, जिनमें से अधिकांश स्टेशनों का काम अभी शुरुआती चरणों में ही अटका हुआ है। प्रशासनिक सूत्रों का मानना है कि यदि वन विभाग के साथ भूमि के इस पेंच को शीघ्र नहीं सुलझाया गया, तो परियोजना की लागत बढ़ने के साथ-साथ इसकी समयसीमा को भी आगे बढ़ाना पड़ सकता है।
"ओल्ड गुरुग्राम मेट्रो परियोजना के अंतर्गत आने वाली सभी बाधाओं को चरणबद्ध तरीके से दूर किया जा रहा है। निर्माण कार्य में तेजी लाने के लिए संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर निर्देश जारी कर दिए गए हैं ताकि तय समय के भीतर नागरिकों को आधुनिक परिवहन सेवा मिल सके।" - प्रशासनिक सूत्र
स्थानीय जनजीवन और आवागमन पर पड़ता असर
मेट्रो विस्तार के इस कार्य में हो रही देरी का सीधा असर स्थानीय नागरिकों, दैनिक यात्रियों और आसपास के व्यापरिक वर्ग पर पड़ रहा है। पुराने गुरुग्राम क्षेत्र में यातायात की समस्या पहले से ही एक विकट चुनौती बनी हुई है, और यदि मेट्रो तथा सर्विस रोड का निर्माण समय पर पूरा नहीं होता है, तो नागरिकों को लंबे समय तक जाम और धूल-मिट्टी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ेगा। क्षेत्रीय लोगों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि वन विभाग और जीएमआरएल के बीच के इस भूमि विवाद को आपसी सहमति से तुरंत सुलझाया जाए, ताकि विकास कार्यों में और अधिक विलंब न हो।
आगामी दिनों में इस मामले को लेकर उच्च स्तरीय बैठकों का दौर और तेज होने की संभावना है, क्योंकि जीएमआरएल किसी भी सूरत में इस प्रोजेक्ट को अपनी तय समय सीमा के आस-पास ही पूरा करने का प्रयास कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण के नियमों का पालन करते हुए प्रशासनिक अमला अब इस बात पर मंथन कर रहा है कि वन विभाग की 'दोगुनी जमीन' वाली शर्त का व्यावहारिक और कानूनी समाधान किस प्रकार निकाला जाए, जिससे राज्य के बुनियादी ढांचे के विकास में कोई रुकावट न आए।




